क्या गांव-किसान की सुध लेगा बजट?

एक फरवरी को पेश होने वाले बजट पर सारे देश की निगाहें लगी हैं। लगातार गिरती जीडीपी विकास दर, बढ़ती महंगाई दर और बेरोजगारी, मांग और निवेश की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक आपदा आदि की समस्याओं से वित्त मंत्री देश को कैसे निकालती हैं, यह अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय है। मंदी के बादलों को हटाने में बजट में क्या कदम उठाए जाते हैं सभी जानना चाहते हैं। परन्तु इस मंदी से उबरने का रास्ता केवल ग्रामीण भारत से होकर ही गुजरता है।

वर्तमान वित्त वर्ष का कुल बजट लगभग 27,86,349 करोड़ रुपये है। इसमें से कृषि मंत्रालय को 138,564 करोड़ रुपये, ग्रामीण विकास मंत्रालय को 117,650 करोड़ रुपये, रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी के लिए 80,000 करोड़ रुपये, तथा मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय को मात्र 3,737 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। इन सबको जोड़ दें तो ग्रामीण भारत का 2019-20 का कुल बजट लगभग 340,000 करोड़ रुपए है। यह सम्पूर्ण बजट का लगभग 12 प्रतिशत है जबकि ग्रामीण भारत में लगभग 70 प्रतिशत आबादी बसती है। अब यह कितना उचित है यह बात पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं।

मार्च 2018 की तिमाही में देश की जीडीपी विकास दर 8.1 प्रतिशत थी जो सितम्बर 2019 की तिमाही में गिरकर 4.5 प्रतिशत पर आ गई है। वित्त वर्ष 2019-20 में जीडीपी विकास दर पांच प्रतिशत से कम रहने का अनुमान है। अर्थव्यवस्था में छाई मंदी का मूल कारण मांग की कमी बताया गया है। इससे उबरने के लिए हमें ग्रामीण क्षेत्र के लिए उचित मात्रा में बजट आवंटन करना होगा। इससे मांग तत्काल बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था के पहिये गति के साथ चल पड़ेंगे।

सरकार ने एक बहुत ही सराहनीय योजना- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम- किसान) शुरू की है। इस योजना का 2019-20 में 75,000 करोड़ रुपये का बजट है। परन्तु इस वर्ष इस बजट में से केवल 50,000 करोड़ रुपये ही बांटे जाने की संभावना है। इसके पीछे किसानों का धीमी गति से सत्यापन होना है। अब तक इस योजना में कुल 14.5 करोड़ किसानों में से केवल 9.5 करोड़ किसानों का ही पंचीकरण हुआ है। इनमें से अभी तक केवल 7.5 करोड़ किसानों का ही सत्यापन हो पाया है। बंगाल जैसे कुछ राज्यों ने राजनीतिक कारणों से अभी तक अपने एक भी किसान का पंजीकरण नहीं करवाया है, जो वहां के किसानों के साथ एक अन्याय है। परन्तु खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए आगामी बजट में इसमें दी जाने वाली राशि को 6,000 रुपये से बढ़ाकर 24,000 रुपये प्रति किसान प्रति वर्ष किया जाना चाहिए। भविष्य में भी इस योजना की राशि को महंगाई दर के सापेक्ष बढ़ाना चाहिए। किसानों को 24,000 रुपये मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में तुरन्त क्रय-शक्ति बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था की गाड़ी तेजी से आगे बढ़ेगी।

पशुपालन और दुग्ध उत्पादन कृषि का अभिन्न अंग है और कृषि जीडीपी में इसकी लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है। परन्तु पशुपालन और डेयरी कार्य हेतु बजट मात्र 2,932 करोड़ रुपये है। दुग्ध उत्पादन और पशुपालन जैसी अति महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि का बजट कृषि बजट का कम से कम 30 प्रतिशत यानी लगभग 45,000 करोड़ रुपये होना चाहिए।

पशुपालन से होने वाली आय कृषि आय की तरह आयकर से भी मुक्त नहीं है। आगामी बजट में इस विसंगति को दूर किया जाना चाहिए। दूध के क्षेत्र में अमूल जैसी किसानों की अपनी सहकारी संस्थाएं काम कर रही हैं। ये उपभोक्ता द्वारा खर्च की गई राशि का 75 प्रतिशत किसानों तक पहुंचाती हैं। पिछले साल सरकार ने घरेलू कंपनियों के आयकर की दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया था, परन्तु किसानों की इन सहकारी संस्थाओं पर आयकर पहले की तरह 30 प्रतिशत की दर से ही लग रहा है। जबकि 2005-06 तक इन सहकारी संस्थाओं पर कंपनियों के मुकाबले पांच प्रतिशत कम दर से आयकर लगता था। कंपनियों से भी अधिक आयकर लगाना किसानों के साथ अन्याय है, इसे तत्काल 2005-06 से पहले वाली व्यवस्था के अनुरूप यानी 17 प्रतिशत किया जाना चाहिए।

2012 तक किसानों की सहकारी संस्थाओं को मिलने वाले ऋण को रिज़र्व बैंक ‘प्राथमिक क्षेत्र कृषि ऋण’ के रूप में परिभाषित करता था। आगामी बजट में 2012 से पहले की स्थिति को बहाल कर किसानों की इन सहकारी संस्थाओं को मिलने वाले ऋण को रिज़र्व बैंक पुनः ‘प्राथमिक क्षेत्र को दिए कृषि ऋण’ के रूप में ही परिभाषित करे, ताकि किसानों की इन संस्थाओं को महंगा ऋण लेने के लिए मजबूर ना होना पड़े। सरकार को दुग्ध उत्पादन की लागत कम करने हेतु सस्ता पशु-आहार, सस्ती पशु-चिकित्सा और दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए बजट में कदम उठाने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती आवारा पशुओं की संख्या एक विकराल समस्या बन गई है। इनकी संख्या सीमित करने और इनके आर्थिक उपयोग के लिए विशेष बजट प्रावधान करने होंगे।

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की मनरेगा योजना का बजट 60,000 करोड़ रुपये है। इस योजना को खेती किसानी से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि किसानों की श्रम की लागत कम हो और इस योजना में गैर उत्पादक कार्यों में होने वाली धन की बर्बादी को रोका जा सके।

कृषि हेतु रासायनिक उर्वरकों की सब्सिडी 80,000 करोड़ रुपये है। यूरिया खाद पर अत्यधिक सब्सिडी के कारण इस खाद का ज़रूरत से ज्यादा प्रयोग हो रहा है जिससे ज़मीन और पर्यावरण दोनों का क्षरण हो रहा है। इस सब्सिडी को भी सीधे किसानों के खातों में नकद भेजा जाए तो खाद सब्सिडी में भारी कमी भी होगी और रासायनिक खाद का अत्यधिक मात्रा में प्रयोग भी बंद होगा।

हम तिलहन को छोड़कर बाकी लगभग सभी कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भर हैं या घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। अतः हमें बजट में कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण, भंडारण, शीतगृहों और वितरण प्रणाली की आधारभूत संरचना को विकसित करने हेतु उचित आवंटन करना होगा। हमें कृषि उत्पाद विपणन अधिनियम और आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानूनों से भी कृषि उत्पादों के व्यापार को मुक्त करने की दिशा में बढ़ना होगा।

आज गेहूं-चावल के अत्यधिक मात्रा में भंडार होने से परेशान है। दिसंबर 2019 में भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में लगभग 213 लाख टन चावल और 352 लाख टन गेहूं था, यानी कुल मिलाकर इन दोनों खाद्यान्नों का स्टॉक 565 लाख टन था। जबकि 1 जनवरी को यह बफर स्टॉक 214 लाख टन होना चाहिए। इसके अलावा 260 लाख टन धान भी गोदामों में पड़ी है। देश का खाद्य सब्सिडी का बिल 1.84 लाख करोड़ रुपये है जिसे तत्काल कम किया जाना चाहिए। खाद्य सब्सिडी को वास्तविक जरूरतमंदों तक ही सीमित करना होगा। इसके लिए लाभार्थियों को सीधे नकद राशि हस्तांतरण करना उचित होगा।

कृषि उत्पादों का निर्यात किसानों की आमदनी बढ़ाने में बहुत मददगार होता है। भारत ने 2013-14 में 4,325 करोड़ डॉलर (आज के मूल्यों में लगभग तीन लाख करोड़ रुपये) मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था, परन्तु इसके बाद हम इस स्तर को कभी भी छू नहीं पाए। अतः हमें बजट में कृषि जिन्सों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विशेष बजट प्रावधान करने होंगे। अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए ग्रामीण भारत के लिए उठाए गए ये कदम अत्यधिक उपयोगी साबित होंगे।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष है)

 

क्यों किसानों पर भारी पड़ेगा खाड़ी देशों का तनाव

अमेरिका द्वारा ईरान के एक सैनिक जनरल को मारे जाने और ईरान की फिलहाल सीमित जवाबी कार्यवाही के बाद खाड़ी क्षेत्र में एक तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। लगातार हो रही छिटपुट घटनाओं के कारण पश्चिम-एशियाई देशों में हालात कभी भी विस्फोटक हो सकते हैं। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए कच्चे पेट्रोलियम तेल की कीमतें जो 70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थी अब नरम होकर फिलहाल वापस लगभग 61 डॉलर पर आ गई हैं। परन्तु यह मान लेना कि खतरा पूरी तरह से टल गया है, समझदारी नहीं है। यदि फिर से तनाव बढ़ा तो इसके व्यापक असर होंगे जिनका आंकलन किया जाना चाहिए। हमारा देश अपनी मांग के लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है।

2018-19 में हमने लगभग 8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 22.6 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था जिसमें से लगभग 65 प्रतिशत खाड़ी देशों से आया था। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर हमारी तेल आपूर्ति पर पड़ सकता है। यदि कलह बढ़ी तो कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ने से हमारा आयात महंगा होगा। इससे देश का चालू खाता घाटा बढ़ेगा और रुपये की कीमत गिरेगी। इस कारण पहले से ही बेकाबू चल रही महंगाई दर और बढ़ेगी। रिज़र्व बैंक भी ब्याज़ दरें घटा नहीं पायेगा जिससे निवेश घटेगा। डीजल, पेट्रोल, गैस आदि की महंगाई का असर किसान की लागत पर सीधा या परोक्ष रूप से पड़ता है क्योंकि ट्रैक्टर, डीजल इंजन और अन्य मशीनों को चलाने की लागत बढ़ेगी। महंगाई दर बढ़ने के कारण अपने इस्तेमाल की अन्य वस्तुएं किसान को और महंगी खरीदनी होंगी।

रुपये की कीमत गिरने से आयातित खाद के दाम भी बढ़ेंगे। कच्चे तेल से प्राप्त कई उत्पादों का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों को बनाने में भी होता है। इस कारण खाद और कच्चे तेल के दाम एक दिशा में चलते हैं। अतः कच्चे तेल के महंगा होने से देश में निर्मित और आयातित दोनों तरह के खाद के दाम बढ़ेंगे और खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल भी बढ़ेगा। तेल के दाम यदि ज्यादा बढ़ गये तो देश का राजकोषीय घाटा भी बढ़ेगा। खाड़ी देशों में लगभग 80 लाख भारतीय रह रहे हैं जो 4,000 करोड़ डॉलर (लगभग 285,000 करोड़ रुपये) सालाना भारत में भेजते हैं। यदि अशांति फैली तो उनके रोजगार और आमदनी पर भी असर पड़ेगा जिससे देश में आने वाली यह विदेशी मुद्रा भी खतरे में पड़ जाएगी। उनमें से लाखों को अपना रोजगार और घर-बार छोड़कर वापस देश में लौटना पड़ सकता है जिसके अपने अलग आर्थिक व अन्य नकारात्मक प्रभाव होंगे। अतः सरकार के हाथ में संसाधन कम होंगे जिससे कृषि, ग्रामीण योजनाओं के बजट और कृषि निवेश में कटौती हो सकती है।

अगर ऐसा हुआ तो पहले ही मंदी से जूझ रही हमारी अर्थव्यवस्था और कमजोर हो जाएगी जिसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। इस अशांत माहौल का प्रभाव इन देशों में हो रहे हमारी कृषि जिंसों के निर्यात पर भी पड़ेगा। यदि अस्थिरता के कारण हम ईरान और अन्य खाड़ी देशों को अपने कृषि उत्पादों का निर्यात नहीं कर पाते हैं तो अच्छे बाज़ार के अभाव में इन कृषि जिंसों के दाम गिरेंगे जिसका नकारात्मक असर हमारे किसानों की आय पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर हमारे किसानों की आय पर कैसे पड़ेगा इसे हमारे चावल के निर्यात से समझा जा सकता है। खाद्यान्न के लिहाज से धान देश की सबसे बड़ी फसल है जिसकी खेती पर करोड़ों किसानों की जीविका निर्भर है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। हम 120 से 130 लाख टन चावल का निर्यात प्रति वर्ष करते हैं। 2018-19 में हमने 471 करोड़ डॉलर मूल्य के बासमती चावल और 304 करोड़ डॉलर मूल्य के गैर-बासमती चावल का निर्यात किया था। इस प्रकार कुल मिलाकर 2018-19 में हमने लगभग 55,000 करोड़ रुपये मूल्य के चावल का निर्यात किया था। पिछले साल लगभग 33,000 करोड़ रुपये मूल्य के बासमती चावल के निर्यात में से लगभग 11,000 करोड़ रुपये की यानी एक-तिहाई हिस्सेदारी ईरान की थी। 2018-19 में हमने ईरान से लगभग 2.4 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था। परन्तु ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण मई 2019 से हमें भी ईरान से कच्चे तेल का आयात बन्द करना पड़ा। इस कारण ईरान को होने वाले हमारे निर्यात के भुगतान की समस्या खड़ी हो गई जिससे इस निर्यात पर बहुत ही नकारात्मक असर पड़ा। इसका प्रभाव बासमती चावल की कीमतों पर भी पड़ रहा है। 1121 प्रीमियम किस्म के बासमती चावल का निर्यात भाव छह-सात महीने पहले लगभग 1200 डॉलर प्रति टन था। अब यह गिरकर लगभग 900 डॉलर प्रति टन के आसपास आ गया है जो पिछले पांच साल का सबसे कम दाम है। ईरान से तेल ना खरीदने के कारण पहले ही भारतीय चावल की मांग वहां घट रही थी। अब खाड़ी देशों में अस्थिरता को देखते हुए हमारे बासमती चावल की मांग और कीमतों के और नीचे जाने की आशंका है।

चावल निर्यातकों का मानना है कि यदि हालात और बिगड़े या प्रतिबंधों के कारण हम ईरान की चावल की मांग पूरी नहीं कर पाए तो ईरान के चावल बाजार पर पाकिस्तान जैसे अन्य चावल निर्यातक देश कब्जा जमा सकते हैं। फिलहाल भारतीय चावल निर्यातक संघ ने अस्थिरता को देखते हुए चावल निर्यातकों को ईरान को चावल निर्यात ना करने की सलाह दी है।

2019 में भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में लगभग 213 लाख टन चावल और 352 लाख टन गेहूं था, यानी कुल मिलाकर इन दोनों खाद्यान्नों का स्टॉक 565 लाख टन था। जबकि 1 जनवरी को यह बफर स्टॉक 214 लाख टन होना चाहिए। इसके अलावा 260 लाख टन धान भी गोदामों में पड़ी है। परन्तु अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण निर्यात घटने और खाड़ी देशों में तनाव से चावल की कीमतों पर और दबाव बढ़ेगा।

इस साल पंजाब में किसानों को 1121 किस्म की बासमती धान का भाव 2800 से 3000 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है, जो पिछले साल ईरान से अच्छी मांग के चलते 3600-3800 रुपये प्रति क्विंटल था। भारत ने 2013-14 में 4,325 करोड़ डॉलर (आज के मूल्यों में लगभग तीन लाख करोड़ रुपये) मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था, जो 2016-17 में गिरकर 3,370 करोड़ डॉलर पर आ गया था। इसके बाद के सालों में इसमें कुछ बढ़ोतरी हुई और यह 2018-19 में बढ़कर 3,920 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया। परन्तु 2019-20 में अप्रैल से सितंबर की पहली छमाही में यह केवल 1,730 करोड़ डॉलर के स्तर पर है जो 2018-19 में इस अवधि में 1,902 करोड़ डॉलर था। खाड़ी देशों में अशांति और अनिश्चितता के कारण 2019-20 की दूसरी छमाही में इसमें और गिरावट आ सकती है।

कृषि उत्पादों का निर्यात किसानों की आमदनी को बढ़ाने में भी मददगार होता है। लेकिन 2020 की शुरुआत में ही पश्चिम एशिया पर छाए अशांति के बादल हमारे देश के लिए, वहां रह रहे भारतीयों और विशेषकर हमारे किसानों के लिए अच्छी खबर नहीं है।

 (लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)


	

क्यों घाटे में हैं दूध उत्पादक किसान?

दूध के बढ़ते दामों से चिंतित केंद्र सरकार ने पिछले दिनों सभी प्रमुख डेरियों की एक बैठक बुलाई थी। प्याज के मामले में किरकिरी होने के बाद सरकार दूध को लेकर पहले ही सतर्क रहना चाहती है। कुछ दिनों पहले ही डेयरियों ने दूध के दाम दो से तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ाए हैं। यह पिछले सात महीनों में दूसरी बढ़ोतरी थी। दूध के दाम बढ़ने के कारणों को जानने के लिए पिछले दस वर्षों में दूध की कीमतों और सरकारी नीतियों का आंकलन करना जरूरी है।

फरवरी 2010 में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध का दाम 30 रुपये प्रति लीटर थे, जो मई 2014 में बढ़कर 48 रुपये प्रति लीटर हो गए। यानी दूध का दाम सालाना औसतन 15 प्रतिशत की दर से बढ़ा। मोदी सरकार के पांच सालों के कार्यकाल में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध का दाम मई 2014 में 48 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर मई 2019 में 53 रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गया। यानी हर साल औसतन महज 2.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इस अवधि में 3.3 प्रतिशत की उपभोक्ता खाद्य महंगाई दर को देखते हुए दूध के वास्तविक दाम घट गए। मतलब, जब खाने-पीने की बाकी चीजों के दाम सालाना 3.3 फीसदी की दर से बढ़े तब दूध के दाम में केवल 2.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। महंगाई को जोड़कर देखें तो दूध उत्पादक किसानों को नुकसान ही हुआ।

दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत और खाद्य महंगाई दर के हिसाब से दूध के दाम कम से कम 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ते, तब भी मई 2019 में फुल-क्रीम दूध का दाम कम से कम 65 रुपये प्रति लीटर होना चाहिए था। जबकि 15 दिसंबर को हुई बढ़ोतरी के बाद भी फुल-क्रीम दूध का दाम दिल्ली में 55 रुपये प्रति लीटर ही हैं। यानी हालिया बढ़ोतरी के बावजूद उपभोक्ताओं को दूध लगभग 10 रुपये लीटर सस्ता मिल रहा है।

डेयरी क्षेत्र में अमूल जैसी सहकारी संस्थाओं के कारण एक तरफ तो उपभोक्ताओं को दूध के बहुत अधिक दाम नहीं चुकाने पड़ते, वहीं दूसरी तरफ दूध के दाम का लगभग 75 फीसदी पैसा दूध उत्पादकों तक पहुंचता है। देश में हर साल किसान लगभग 10 करोड़ टन दूध बेचते हैं। दूध के दाम 10 रुपये प्रति लीटर कम मिलने के कारण दुग्ध उत्पादक किसान लगभग एक लाख करोड़ रुपये सालाना का नुकसान अब भी सह रहे हैं।

दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत को देखते हुए किसान पशुओं को उचित आहार और चारा भी नहीं खिला पा रहे हैं। पशुओं के इलाज और रखरखाव पर होने वाले खर्चे में भी कटौती करनी पड़ी। डीज़ल के दाम और मजदूरी भी पिछले पांच सालों में काफी बढ़े हैं, जिसका प्रभाव दूध के दामों में दिख रहा है। इस बीच, ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा पशुओं की संख्या बेतहाशा बढ़ी है जो दुधारू पशुओं के हरे चारे को बड़ी मात्रा में खेतों में ही खा जाते हैं। इसका असर दुधारू पशुओं के लिए चारे और पशु-आहार की उपलब्धता पर पड़ रह है।

भारतीय चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान के अनुसार देश में हरे चारे की 64 प्रतिशत और सूखे चारे की 24 प्रतिशत कमी है। हाल के वर्षों में पशु-आहार जैसे खल, चूरी, छिलका आदि के दाम भी काफी बढ़े हैं जिस कारण दुग्ध उत्पादन की लागत में काफी वृद्धि हुई है।

गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी और सरकारी नीतियों के कारण बांझ और बेकार पशुओं का व्यापार और परिवहन बहुत जोखिम भरा हो गया है। इस कारण अनुपयोगी पशुओं खासकर गौवंश का कारोबार लगभग समाप्त हो गया है। इन्हें बेचकर किसानों के हाथ में कुछ पैसा आ जाता था, जो नये पशुओं की खरीद और मौजूदा पशुओं की देखरेख पर खर्च होता था। आय का यह स्रोत लगभग समाप्त हो गया है, उल्टा आवारा पशु ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों पर बोझ बन गए हैं। इसका खामियाजा एक तरफ दुग्ध उत्पादन किसानों को तो दूसरी तरफ महंगे दूध के रूप में उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है।

इस बीच सहकारी और निजी डेयरियों द्वारा किसानों से खरीदे जाने वाले दूध की मात्रा पिछले साल के मुकाबले 5-6 प्रतिशत कम हुई है। इस वर्ष विलंब से आये मानसून के कारण कई राज्यों में पहले तो सूखा पड़ा, फिर बाद में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन गई। इस कारण भी चारे की उपलब्धता घटी है। अक्टूबर से मार्च के बीच का समय दूध के अधिक उत्पादन का सीजन होता है जिसे ‘फ्लश सीज़न’ कहते हैं। इस दौरान दूध के दाम बढ़ने की संभावना ना के बराबर होती है। लेकिन इस बार सर्दियों में दाम बढ़ाने के बावजूद डेरियों की दूध की खरीद में गिरावट आना अच्छा संकेत नहीं है।

पिछले साल जब देश में दूध पाउडर का काफी स्टॉक था और इसके दाम गिरकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गए थे, तब सरकार ने दूध पाउडर के निर्यात के लिए 50 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी दी थी। अब दूध पाउडर के दाम दोगुने होकर 300 रुपये प्रति किलोग्राम हो गए हैं। यदि पिछले साल सरकार दूध पाउडर का बफर स्टॉक बना लेती तो उस वक्त किसानों को दूध की कम कीमत मिलने से नुकसान नहीं होता और आज उपभोक्ताओं को भी बहुत अधिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

 

देश में ‘चीनी कम’ फिर भी क्यों नहीं बढ़े गन्ने के दाम?

पिछले दिनों पूरे उत्तर प्रदेश में जगह-जगह गन्ना किसानों ने प्रदर्शन कर गन्ने की होली जलाई। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद तीन वर्षों में गन्ने के भाव में केवल 2017-18 में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई थी। उत्तर प्रदेश में गन्ने का एसएपी यानी राज्य परामर्शित मूल्य पिछले दो सालों से 315-325 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है। इस साल गन्ना किसानों को सरकार से गन्ने का भाव बढ़ने की बड़ी उम्मीद थी, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। जबकि पिछले दो सालों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और विशाल चीनी-भंडार से परेशान चीनी उद्योग की स्थिति इस साल सुधर गई है। इस कारण सभी आर्थिक तर्क भी भाव बढ़ाने के पक्ष में थे। इस साल देश में चीनी उत्पादन कम होने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मांग के कारण चीनी उद्योग को तो पूरी राहत मिलेगी, परन्तु गन्ने के रेट ना बढ़ने से गन्ना किसानों की स्थिति और बिगड़ेगी।

2018-19 में देश में चीनी का आरंभिक भंडार (ओपनिंग स्टॉक) 104 लाख टन, उत्पादन 332 लाख टन, घरेलू खपत 255 लाख टन और निर्यात 38 लाख टन रहा। इस प्रकार वर्तमान चीनी वर्ष में चीनी का प्रारंभिक भंडार 143 लाख टन है। अतः हमारी लगभग सात महीने की खपत के बराबर चीनी पहले ही गोदामों में रखी हुई है। कुछ महीने पहले तक यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति थी जिसको देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों को चीनी की जगह एथनॉल बनाने के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए थे।

इस्मा (इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन) के अनुसार देश में इस वर्ष चीनी का उत्पादन पिछले वर्ष के 332 लाख टन के मुकाबले घटकर लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है, जो केवल घरेलू बाज़ार की खपत के लिए ही पर्याप्त होगा। इस गन्ना पेराई सत्र की पहली तिमाही अक्टूबर से दिसंबर 2019 के बीच चीनी का उत्पादन पिछले साल की इस अवधि के मुकाबले 30 प्रतिशत घटकर 78 लाख टन रह गया है। पिछले साल इस अवधि में देश में चीनी का उत्पादन 112 लाख टन था।

2019-20 में विश्व में चीनी का उत्पादन 1756 लाख टन और मांग 1876 लाख टन रहने की संभावना है। यानी उत्पादन मांग से 120 लाख टन कम होने का अनुमान है। इस कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की अच्छी मांग होगी, जिसकी आपूर्ति भारत कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी उत्पादन में संभावित कमी से हमारे पहाड़ से चीनी भंडार अचानक अच्छी खबर में बदल गए हैं। उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग का इस स्थिति में सबसे ज्यादा लाभ होगा क्योंकि पिछले साल की तरह इस साल भी चीनी उत्पादन में प्रथम स्थान पर उत्तर प्रदेश ही रहेगा, जहां 120 लाख टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश के किसानों ने 33,048 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की आपूर्ति चीनी मिलों में की थी। परन्तु 31 दिसंबर 2019 तक इसमें से 2,163 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया है। चालू पेराई सत्र में तीन महीने बीतने के बाद भी 31 दिसंबर तक इस सीज़न का केवल 3,492 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान हुआ है, जबकि किसान लगभग 10,500 करोड़ रुपये मूल्य का गन्ना चीनी मिलों को दे चुके हैं। इसके अलावा विलम्बित भुगतान के लिए देय ब्याज़ का आंकड़ा भी 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। इस तरह 31 दिसंबर तक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का चीनी मिलों के ऊपर 11,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान बकाया है।

इस साल गन्ना मूल्य निर्धारण से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी हितधारकों से विचार विमर्श किया था। इस बैठक में उत्तर प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति, चीनी के अत्यधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर इस साल भी गन्ने का रेट ना बढ़ाने की मांग रखी थी। किसानों का कहना है कि दो सालों से गन्ने के रेट नहीं बढ़ाये गए हैं जबकि लागत काफी बढ़ गई है। गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर के अनुसार गन्ने की औसत उत्पादन लागत लगभग 300 रुपये प्रति क्विंटल आ रही है। सरकार के लागत के डेढ़ गुना मूल्य देने के वायदे को भूल भी जाएं तो भी बदली परिस्थिति में कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलना चाहिए था। यदि पिछले तीन सालों में 10 प्रतिशत की मामूली दर से भी वृद्धि की जाती तो भी इस वर्ष 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव अपने आप हो जाता।

वास्तविकता तो यह है कि चीनी मिलें चीनी के सह-उत्पादों जैसे शीरा, खोई (बगास), प्रैसमड़ आदि से भी अच्छी कमाई करती हैं। इसके अलावा सह-उत्पादों से एथनॉल, बायो-फर्टीलाइजर, प्लाईवुड, बिजली व अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं। गन्ना (नियंत्रण) आदेश के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनों के अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। भुगतान में विलम्ब होने पर 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होता है। परन्तु चीनी मिलें साल-साल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की इस पूंजी का बिना ब्याज दिये इस्तेमाल करती हैं। इस तरह चीनी मिलें अपने बैंकों के ब्याज के खर्चे की बचत भी करती हैं। पिछले दो सालों में सरकार ने चीनी मिलों को चीनी बफर स्टॉक, एथनॉल क्षमता बनाने और बढ़ाने, चीनी निर्यात के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए हैं। इसके बावजूद भी मिलों ने गन्ने का समय पर भुगतान नहीं किया और न ही सरकार ने गन्ने का भाव बढ़ाया।

महंगाई के प्रभाव और बढ़ती लागत के कारण गन्ने का वास्तविक दाम घट गया है। बदली परिस्थितियों में कम चीनी उत्पादन और अच्छी अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए सरकार को लाभकारी गन्ना मूल्य दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए था। परन्तु इस स्थिति का सारा लाभ अब चीनी मिलें ही उठाएंगी और किसानों के हाथ मायूसी के अलावा कुछ नहीं लगेगा। सरकार अब भी अलग से बोनस देकर गन्ना किसानों को बदहाली से बचा सकती है।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)