AC में सूखे का पता ही नहीं चला? जानिए, कितने भीषण हैं हालत

जब तक फ्रीज में पानी की बोतलें भरी हैं और नल में पानी आ रही है, तब तक देश में सूखे का अहसास होना मुश्किल है। ठीक उसी तरह जैसे जब तक दिल्ली का दम स्मॉग में नहीं घुटने लगा, तब तक बहुत कम लोगों को वायु प्रदूषण की गंभीरता का अहसास था।

बहरहाल, देश के तकरीबन आधे हिस्से में सूखे के हालत हैं। इस स्थिति का अंदाजा तो मार्च-अप्रैल से ही होने लगा था, मगर तब पूरा देश चुनावी चर्चा में मशगूल था। अब मानसून का इंतजार करते-करते एक-एक दिन गुजर रहा है तो सूखे की तरफ ध्यान गया। हालांकि, देश में नए बने जल शक्ति मंत्रालय के मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जल संकट की खबरों को “मीडिया हाइप” करार दे चुके हैं। फिर भी जान लीजिए, देश में सूखे की स्थिति कितनी गंभीर है।

  1. मौसम विभाग ने इस साल मानसून में सामान्य के मुकाबले 96 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया है। प्राइवेट एजेंसी स्काईमेट का अनुमान और भी कम है। स्काईमेट के अनुसार, इस बार मानसून सीजन में 93 फीसदी बारिश होगी। यानी मानकर चलिए इस बार बहुत से इलाके बारिश के लिए तरस जाएंगे।
  2. पिछले पांच वर्षों में 2017 को छोड़कर हर साल मानसून में बारिश सामान्य से कम रही। लेकिन इस साल मानसून से पहले ही सूखे की मार पड़नी शुरू हो गई थी। बीते 1 मार्च से 31 मई के दौरान देश में सामान्य से 25 फीसदी कम यानी 99 मिलीमीटर हुई है। पिछले 65 वर्षों में यह दूसरा मौका है जब मानसून से पहले इतनी कम बारिश हुई और प्री-मानसून सूखे की स्थिति पैदा हो गई।
  3. आईआईटी, गांधीनगर की सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली के मुताबिक, देश का 44.41 फीसदी हिस्सा सूखे की स्थितियों का सामना कर रहा है जबकि पिछले साल इसी समय देश के 33.24 फीसदी हिस्से में सूखे के हालात थे। यानी पिछले साल के मुकाबले स्थिति काफी खराब है।
  4. इस साल मानसून देरी से पहुंचने के बाद बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इस बीच, अरब सागर में उठे ‘वायु’ चक्रवात ने भी इसकी गति को बाधित किया है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि 20 जून के बाद मानसून जोर पकड़ेगा।
  5. इस मानसून सीजन में 1-19 जून के दौरान देश में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश हुई है। देश के 36 मौसम क्षेत्रों में से 30 क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश है जबकि केवल 6 मौसम क्षेत्रों में सामान्य या इससे अधिक बारिश हुई है। विदर्भ में सामान्य से 89 फीसदी, मराठवाडा में 75 फीसदी, पश्चिमी यूपी में 73 फीसदी, पूर्वी यूपी में 84 फीसदी और झारखंड में 71 फीसदी कम बारिश से सूखे के खतरे को समझा जा सकता है।
  6. महाराष्ट्र और कर्नाटक के ज्यादातर जिले सूखे के संकट से जूझ रहे हैं। 47 साल का सबसे भीषण सूखा झेल रहे महाराष्ट्र की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पश्चिमी महाराष्ट्र के कई गांवों से लोग पलायन करने पर मजबूर हैं। कई जिलों में टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। राज्य के 35 बड़े बांध लगभग खाली हो चुके हैं, नदियां सूखी हैं और करीब 20 हजार गांव सूखे की चपेट में हैं।
  7. यूपी के बुंदेलखंड से भी सूखे के चलते लोग गांव छोड़नेे को मजबूूूर हैं। बिहार में लू लगने से 108 लोगों के मरने की पुष्टि खुद राज्य सरकार कर चुकी है। अकेले गया जिले में लू लगने से 33 लोगों की मौत हो चुकी है। भीषण गर्मी को देखते हुए बिहार के 6 जिलों में धारा 144 लगा दी गई है।
  8. सूखे के इस संकट का सीधा संबंध बढ़ती गर्मी और मरुस्थलीकरण से है। इस साल पहली बार दिल्ली का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया, जबकि 50.8 डिग्री तापमान के साथ राजस्थान के चुरू में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट गए।
  9. नीति आयोग की एक रिपोर्ट देश में भीषण जल संकट से आगाह करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 तक दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई और हैदराबाद जैसे 21 महानगरों में भूजल समाप्त हो जाएगा और 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी पेयजल के लिए तरसेगी। फिलहाल, भारत में करीब 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं।
  10. नीति आयोग की आशंका चेन्नई में सच साबित होती दिख रही है। शहर में पानी की इतनी किल्लत है कि कई आईटी कंपनियों ने कर्मचारियों को दफ्तर आने से मना कर घर से काम करने को कहा है। चेन्नई को जलापूर्ति करने वाले चार प्रमुख जलाशय लगभग सूख चुके हैं। शहर में हाहाकार मचा है। देश-विदेश का मीडिया चेन्नई के जल संकट को कवर कर रहा है।
  11. केंद्रीय भूजल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। दक्षिण और पश्चिमी भारत के जलाशयों में जलस्तर 10 साल के औसत यानी सामान्य स्तर से नीचे चला गया है। हालांकि, देश में कुल मिलाकर जलाशयों में जलस्तर पिछले साल से बेहतर है लेकिन देश के 91 में से 71 जलाशयों में पानी घट रहा है।
  12. देश के बड़े हिस्से में सूखे का असर सोयाबीन, कपास, धान और मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुवाई पर भी पड़ रहा है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, 14 जून तक खरीफ की बुवाई पिछले साल की तुलना में 9 फीसदी कम है। असिंचित क्षेत्रों में किसान खरीफ की बुवाई के लिए बारिश की आस लगाए बैठे हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना उत्पादक राज्यों में सूखे की वजह से चीनी का उत्पादन 15 फीसदी घट सकता है। विदर्भ में संतरे के आधे से ज्यादा बगीचे सूखकर बर्बाद होने की खबरें आ रही हैं।

 

 

अमेरिकी बादाम-अखरोट कैसे पचा लेती है हमारी देशभक्ति?

देश के किसान जो कुछ भी उगाते हैं, उसका बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को बेचा जाता है। इसी तरह हम अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खाने-पीने की चीजों खासकर फलों, दालों और खाद्य तेलों का आयात करते हैं। कृषि व्यापार का यह दस्तूर बरसों से चला आ रहा है, लेकिन इसके नियम-कायदे और तौर-तरीके बदलते रहते हैं। किसानों को उनकी उपज का क्या दाम मिलेगा, यह बहुत हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग-पूर्ति और दाम पर निर्भर करता है। आयात-निर्यात से जुड़ी नीतियां और फैसले इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

हाल ही में भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले सेब, बादाम, अखरोट समेत कुल 28 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। यानी, अमेरिका से इन चीजों का आयात महंगा पड़ेगा। यह कदम अमेरिका की उस कार्रवाई के विरोध में उठाया गया, जिसके तहत भारत से ड्यूटी फ्री एक्सपोर्ट जैसी रियायतें खत्म कर दी गई हैं। व्यापार मोर्चे पर अमेरिका के साथ इस तनातनी के अलावा भारत का बढ़ता कृषि आयात और घटता निर्यात अपने आप में चिंताजनक है।

साल 2013-14 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों के दौरान भारत के कृषि निर्यात में सालाना 2.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। मतलब, कृषि निर्यात बढ़ने के बजाय घट गया है। जबकि इसी अवधि में कृषि आयात सालाना 6.7 फीसदी की दर से बढ़ा है। जब देश में खाद्यान्न, फल, सब्जियों और दूध का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है, उसी दौर में हम दूसरे देशों से खाने-पीने की चीजों का खूब आयात करते जा रहे हैं। इसकी मार आखिरकार किसानों पर ही पड़ रही है। इस पूरे खेल के पीछे एग्री कमोडिटी ट्रेडिंग के बड़े खिलाड़ियों का हाथ है जो सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

इस खेल के चलते जो चीजें भारत में आसानी से पैदा हो सकती हैं, उनके लिए भी हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं। जो पैसा देश के किसानों की जेब में जा सकता है, वो देश से बाहर जा रहा है। उफनते राष्ट्रवाद के इस दौर में किसानों और देश के हितों पर यह चोट जारी है मगर कहीं कोई चर्चा ही नहीं! किसी को इसकी चिंता ही नहीं! ना ही किसी की राष्ट्रवादी भावनाएं आहत हो रही हैं।

हालत यह है कि भारत अमेरिकी बादाम का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। अमेरिका से हर साल भारत करीब 3,800 करोड़ रुपये का बादाम आयात करता है। इसी तरह भारत अमेरिका के सेब का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और हर साल करीब 1100 करोड़ रुपये का सेब अमेरिका से मंगाता है। देखा जाए तो अमेरिका के सेब, बादाम, अखरोट उगाने वाले किसान भारत के लिए खेती कर रहे हैं। हमारा किसान सही दाम के लिए टमाटर, प्याज  सड़क पर फेंकने से आगे सोच ही नहीं पा रहा है।

सिर्फ सेब और बादाम को ही जोड़ लें तो हर साल करीब 5 हजार करोड़ रुपये का आयात हम अमेरिका से करते हैं। जबकि सेब और बादाम भारत के कई राज्यों में पैदा होता है। किसानों को प्रोत्साहित किया जाए तो इन चीजों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के बजाय भारत अमेरिका और अन्य देशों पर निर्भरता बढ़ाता जा रहा है। खाद्य तेलों और दालों के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। आत्मनिर्भरता के बजाय देश ने आयात निर्भरता का रास्ता चुना है।

पिछले 5 वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। देश का कृषि आयात बढ़ता जा रहा है जबकि निर्यात घटा है। साल 2013-14 में भारत का कृषि आयात करीब 15 अरब डॉलर था जो 2018-19 में बढ़कर 19 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। दूसरी तरफ, 2013-14 में भारत का कृषि निर्यात 42.86 अरब डालर था जो 2018-19 में घटकर 38.49 अरब डालर रह गया है। कृषि आयात और निर्यात का अंतर लगातर सिकुड़ रहा है। यानी ट्रेड सरप्लस कम होता जा रहा है। किसानों के साथ-साथ सरकारी खजाने के लिए भी नुकसानदेह है।

कृषि में वर्षों की मेहनत से हासिल आत्मनिर्भरता को हम आयात निर्भरता में गंवाते जा रहे हैं। जबकि पूरी दुनिया व्यापार युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिका, चीन जैसे ताकतवर देश अपनी व्यापार नीतियों से दूसरे देशों पर वार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। लेकिन विदेशी सेब, बादाम और अखरोट खाकर भी हमारा राष्ट्रप्रेम खूब फल-फूल रहा है। राष्ट्रवाद के समूचे नैरेटिव से स्वदेशी के स्वर लुप्तप्राय हैं। जबकि स्वेदशी के पेरोकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में हैं। लेकिन चीन की पिचकारियों और झालर, फुलझड़ियों के अलावा शायद ही किसी चीज के आयात का विरोध हाल के वर्षों में हुआ है।

माना कि देश के दरवाजे अमेरिका या दूसरे देशों के लिए बंद नहीं किए जा सकते हैं। विश्व व्यापार की अपनी मजबूरियां हैं। लेकिन जिन चीजों का हर साल हजारों करोड़ रुपये का आयात हो रहा है, उनकी पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित तो कर ही सकती है। कृषि आयात को कम से कम रखना देश और किसानों दोनों के हित में है। आयात शुल्क में बढ़ोतरी इसका सीधा, सरल उपाय है। लेकिन अक्सर होता इसके उलट है। देश के दरवाजे सस्ते आयात के लिए खोल दिए जाते हैं।

हिमाचल के सेब उगाने वाले किसान कई साल से आयात की मार झेल रहे हैं। इसी तरह कश्मीर और दूसरे राज्यों के किसान भी अमेरिकन ड्राईफ्रूट के आयात से परेशान हैं। कम से कम आयात की मार झेल रहे इन किसानों के हित में ही सरकार कुछ मददगार कदम उठा ले। कृषि आयात को हतोत्साहित करे। वैसे भी दुनिया में व्यापार युद्ध के हालात बन रहे हैं। बेहतर होगा, हम समय रहते संभल जाएं।

 

 

न्यू इंडिया में दो आत्महत्याएं और एक सबक

23 मई को जब 17वीं लोकसभा के नतीजे देश को चौका रहे थे, तभी मुंबई से एक युवा डॉक्टर की खुदकुशी की खबर भी आई। एक तरह जहां नरेंद्र मोदी और भाजपा की भारी जीत को जातियों की पकड़ कमजोर पड़ने का सबूत बताया जा रहा था, वहीं एक और युवा प्रतिभा जातिगत उत्पीड़न का शिकार हो गई। यह घटना हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की याद दिलाती है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि देश के उम्दा संस्थानों में काम करने वाले लोग भी निजी जिंदगी में कितने रूढ़िवादी और जातिवादी हैं। कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को टॉप संस्थानों में प्रवेश पाने के बावजूद संदेह की नजर से देखा जाता है। उनकी मैरिट पर सवालिया निशान लगाया जाता है।

मुंबई के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट की छात्रा और रेजीडेंट डॉक्टर पायल तडवी की आत्महत्या के मामले में तीन सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों भक्ति मेहर, हेमा आहुजा और अंकिता खंडेलवाल को गिरफ्तार किया गया है। ये तीनों पायल की सीनियर हैं और उसके साथ हॉस्टल में रहती थी। जातिगत आधार पर किसी महिला के उत्पीड़न में महिलाओं का शामिल होना और भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है। जबकि सभी समुदायों की स्त्रियां समान रूप से पितृसत्ता की सताई हुई हैं, फिर भी दलित-पिछड़ी महिलाओं के उत्पीड़न में सवर्ण महिलाएं बढ़-चढ़कर शामिल रहती हैं। इसे परवरिश या माहौल का असर मान सकते हैं लेकिन समूचे नारी विमर्श के लिए जटिल प्रश्न है।

पायल की मां आबेदा तडवी ने आरोप लगाया है कि तीनों सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर उनकी बेटी को जातिगत आधार पर प्रताड़ित किया। वे उसके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करती थी। इस उत्पीड़न से तंग आकर पायल ने फांसी लगाकर जान दे दी। मुंबई पुलिस ने इस केस में अत्याचार-विरोधी, रैगिंग-विरोध और आईटी ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल, पूरा मामला जांच के दायरे में है। यह हत्या है या आत्म हत्या, इसे लेकर भी संदेह है।

सांस्थानिक नाकामी

इस घटना ने उच्च शिक्षण संस्थानों में व्याप्त जातिगत भेदभाव को एक बार फिर उजागर किया है। इस तरह का यह पहला मामला नहीं है। शिक्षा, रोजगार और बाजार से पैदा अवसरों के चलते दलित-पिछड़ों और आदिवासियों को जैसे-जैसे आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं, पुरानी पूर्वाग्रह और टकराव नए-नए रूपों में सामने आ रहे हैं। इन टकरावों की ताजा मिसाल है डॉ. पायल की आत्महत्या! हैरानी की बात है कि संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी उपायों के बावजूद देश के टॉप संस्थान जातिगत भेदभाव रोकने में नाकाम हो रहे हैं।

डॉ. पायल पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल की छात्रा थी और हॉस्टल में उसके साथ होने वाले उत्पीड़न के काफी भयावह ब्यौरे सामने आ रहे हैं। कैसे उस पर जातिगत छींटाकशी की जाती थी, वाट्स एप ग्रुप में मजाक बनाया जाता था और रैगिंग होती थी, ये बातें मीडिया के बड़े हिस्से ने रिपोर्ट की हैं। पता चला है कि कॉलेज प्रशासन को लिखित शिकायत के बावजूद डॉ. पायल को लगातार परेशान किया जाता रहा। पायल की मां आबेदा तडवी का कहना है कि पायल के साथ होने वाले बुरे बर्ताव को उन्होंने अस्पताल में अपने इलाज के दौरान खुद भी महसूस किया था।

देश के उम्दा शिक्षण संस्थानों में जगह बनाने के बावजूद दलित, आदिवासी और पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को किस प्रकार के मानसिक उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है। जबकि आम धारणा है कि शिक्षित होने के साथ लोग जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसी बुराईयों से लोग ऊपर उठ जाएंगे। लेकिन उच्च शिक्षण संस्थान इस मामले में समाज के बाकी हिस्सों से अलग या बेहतर साबित नहीं हो रहे हैं।

आरक्षित सीटों पर प्रवेश पाने वाले उम्मीदवारों को जातिवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें बात-बात में नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है। उनकी प्रतिभा पर सवाल खड़ा किया जाता है। इस तरह अकादमिक जगत के सर्वोच्च शिखरों पर भी जातिगत पूर्वाग्रहों की जकड़ कमजोर नहीं पड़ती। जिस आरक्षण को बरसों के भेदभाव को मिटाने का माध्यम माना गया था, वो एक नए भेदभाव का कारण बना दिया गया है। रोहित वेमुला और पायल तडवी इन दोनों ही मामलों में एक चीज समान है। दोनों के संस्थान उनका बचाव करने, उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहे। जिन संस्थानों पर मानवीय मूल्यों को बचाने का जिम्मा था, वे अपने छात्रों को जातिगत भेदभाव से भी नहीं बचा पाए।

नए संपर्क, नए टकराव

गौर करने वाले बात यह भी है कि बरसों से एक-दूसरे से दूर रहे समुदायों के लोग शिक्षा, रोजगार या आर्थिक गतिविधियों के कारण और लोकतंत्र व बाजार के दबाव में जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, उनके बीच बरसों से दबा द्वेष और टकराव भी उभर रहा है। इस तरह जातियों की पकड़ कुछ ढीली पड़ने और जातीय टकराव बढ़ने का सिलसिला साथ-साथ जारी है। इन टकरावों से बचने-बचाने के पुख्ता उपाय न तो शिक्षण संस्थानों के पास हैं और न ही कार्यस्थलों  पर दिखाई पड़ते हैं।

जातिगत उत्पीड़न के अलावा भारत में छात्रों की खुदकुशी अपने आप में एक बड़ी समस्या है। डॉ. पायल के मामले में ये दोनों समस्याएं सम्मलित रूप से सामने आती हैं। एनसीआरबी के साल 2015 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर घंटे कोई न कोई छात्र खुदकुशी कर लेता है। लैंसेट की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 15 से 29 साल के नौजवानों की सर्वाधिक आत्महत्या दर वाले देशों में शुमार है।

उच्च संस्थान में जातिगत भेदभाव

आश्चर्य की बात है कि तमाम कानूनी और संवैधानिक उपायों और समाज के कथित तौर पर आधुनिक होने के बावजूद जाति के आधार पर दलित, आदिवासी और पिछड़ों के उत्पीड़न की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जबकि दूसरी तरफ जातियों के बंधन टूटने के दावे किये जा रहे हैं। आरक्षण के खिलाफ भी जातिगत भेदभाव खत्म होने का तर्क अक्सर दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि देश में हर 16 मिनट में दलितोंं के खिलाफ कोई न कोई अपराध घटित होता है। दलितों की पिटाई के वीडियो अब आम हो चुके हैं। इसके पीछे कानून का खौफ न होना और समूचे समुदाय को डराने की मंशा नहीं तो और क्या है?

यूपीए सरकार के दौरान सुखदेव थोराट कमेटी ने एम्स में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न कलई खोल दी थी। थोराट समिति को एम्स के 72 फीसदी दलित और आदिवासी छात्रों ने बताया कि वे जातिगत भेदभाव का शिकार हैं। 76 फीसदी छात्रों ने बताया कि परीक्षा में छात्रों का मूल्यांकन भी उनकी जाति से प्रभावित होता है। प्रोफेसर उनके प्रति उदासीन रहते हैं और जाति की वजह से उनकी अनदेखी करते थे। दलित और आदिवासी शिक्षकों का सही प्रतिनिधित्व न होना भी इसकी बड़ी वजह है।

जाति के अलावा कमजोर अंग्रेजी और कम्युनिकेशन स्किल की वजह से भी कैंपसों में कमजोर पृष्ठभूमि वाले छात्रों को मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। क्लासरूम से लेकर हॉस्टल और आपसी मेलजोल में जातिगत भेदभाव कई रूपों में सामने आता है। कुछ साल पहले यूजीसी ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अवसर सेल स्थापित करने की गाइडलाइन जारी की थी लेकिन ज्यादातर मेडिकल कॉलेज यूजीसी के दिशानिर्देशों को लेकर बेपरवाह बने रहे।

दलित-पिछड़ों पर बढ़ते हमले 

डॉ. पायल की खुदकुशी को देश में नफरत के माहौल और दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं से जोड़कर देखा जा सकता है। उत्तराखंड में एक विवाह समारोह के दौरान कुर्सी पर बैठने को लेकर दलित युवक पर जानलेवा हमला हुआ तो गुजरात में दलित युवक को घोड़ी पर चढ़ने से रोकने के थरसक प्रयास किए गए। अलवर में दलित युवती के साथ गैंगरेप और जातिसूचक टिप्पणियों वाला वीडियो वायरल होना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मिंदगी का सबब होना चाहिए। लेकिन हो रहा है इसका उलटा। जातिगत भेदभाव, छुआछूत और उत्पीड़न को नकारने के बजाय दलित-आदिवासियों के सुरक्षा कवच संविधान और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून को ही कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

ये सब घटनाएं उस दौर में हो रही हैं जब गोडसे को देशभक्त बताने वाले संसद में हैं और ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी जा रही है। जबकि इस दौर में देश की कथित ऊंची जातियों को आत्म-मूल्यांकन करने और जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र के आधार पर भेदभाव से ऊपर उठने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो राजनीति में भले ही जातियों के समीकरण ध्वस्त हो जाएं, समाज में डॉ. पायल और रोहित वेमुला जैसी प्रतिभाएं अपना गला घोंटने को मजबूर होती रहेंगी।

(डॉ. के. वेेलेंटीना समाज विज्ञानी और दिल्ली की अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)