नीम कोटेड यूरिया पर कैसे हुआ मिलावट का लेप?

केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में खेती-किसानी के मामले में एक चीज पर काफी जोर दिया है। नीम कोटेड यूरिया! प्रधानमंत्री के तमाम भाषाणों और सरकारी दावों में नीम कोटेड यूरिया के फायदे गिनाए गए।

दरअसल, यूरिया के लिए सरकार किसानों को सब्सिडी देती है। लेकिन किसानों का तो बस नाम है। यह सब्सिडी असल में मिलती है फर्टीलाइजर कंपनियों को। हर साल करीब 65-70 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी फर्टीलाइजर कंपनियों को दी जाती है। यह रकम देश के कृषि बजट से भी बड़ी है तो घपले-घोटाले भी बड़े ही होंगे। सरकारी सब्सिडी से बने यूरिया का गैर-कृषि कार्यों जैसे नकली दूध बनाने, कैमिकल बनाने आदि में डायवर्ट होना और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में तस्करी आम बात हो गई।

देश पर यह दोहरी मार थी। एक तरफ, सब्सिडी का यूरिया देश से बाहर जाने लगा। तो दूसरी तरफ, किसानों के लिए यूरिया की किल्लत होने लगी। यूरिया की तस्करी और कालाबाजारी की यह समस्या काफी पुरानी है। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार ने आते ही इसका तोड़ निकाल लिया। ये तोड़ था नीम कोटेड यूरिया। हालांकि,  नीम कोटेड यूरिया की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हो गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने यूरिया को 100 फीसदी नीम कोटेड करने का फैसला किया। जो बड़ा कदम था।

साल 2015 में सरकार ने देश में यूरिया के संपूर्ण उत्पादन को नीम लेपित करना अनिवार्य कर दिया। आयात होने वाले यूरिया पर भी निंबोलियों के तेल यानी नीम तेल का स्प्रे करना जरूरी था। नीम के इतने ज्यादा अच्छे दिन कभी नहीं आए थे। सरकार का दावा था कि नीम कोटेड यूरिया से मिट्टी की सेहत सुधरेगी और फसल की पैदावार बढ़ेगी। क्योंकि नीम लेपित यूरिया धीमी गति से प्रसारित होता है जिसके कारण फसलों की जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन की खुराक मिलती रहती है। नीम कोटिंग से यूरिया के औद्याेगिक इस्तेमाल और कालाबाजारी पर अंकुश लगने का दावा भी किया गया।

सरकार का मानना है कि नीम कोटिंग के जरिए यूरिया की कालाबाजारी रुकने से सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। बेशक, आइडिया अच्छा था। लागू भी 100 परसेंट हुआ। लेकिन एक नई समस्या खड़ी हो गई।

विज्ञान और पर्यावरण की जानी-मानी पत्रिका डाउन टू अर्थ ने हिसाब-किताब लगाया है कि देश में यूरिया की जितनी खपत है उसे नीम कोटेड करने के लिए जितना नीम तेल चाहिए उतना तो देश में उत्पादन ही नहीं है। जबकि सरकार का दावा है कि आजकल 100 फीसदी यूरिया नीम कोटेड है।

अगर सरकार की बात सही मानें तो सवाल उठता है कि जब देश में यूरिया के समूचे उत्पादन और आयातित यूरिया की कोटिंग के लिए पर्याप्त नीम तेल ही उपलब्ध नहीं है तो फिर नीम कोटिंग हो कैसे रही है? अब या तो यूरिया की 100 फीसदी नीम कोटिंग का सरकारी दावा गलत है या फिर नीम कोटिंग के लिए मिलावटी नीम तेल का इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार ने जब यूरिया की नीम कोटिंग का फैसला किया, ये सवाल कुछ लोगों ने तब भी उठाया था कि यूरिया की इतनी बड़ी मात्रा पर नीम स्प्रे के लिए नीम तेल कहां से आएगा? तब सिर्फ संदेह था, अब हमारे सामने डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट है। वो भी पूरी कैलकुलेशन के साथ!

https://www.downtoearth.org.in/news/governance/towards-a-bitter-end-india-s-neem-shortage-63978

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में नीम ऑयल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि भारत में यूरिया की जितनी खपत है, उसकी कोटिंग के लिए करीब 20,000 टन नीम तेल की जरूरत है। जबकि उपलब्धता सिर्फ 3,000 टन नीम तेल की है। मतलब, जरूरत के मुकाबले मुश्किल से 15 फीसदी नीम का तेल देश में बनता है। सवाल फिर वही है। जब देश में इतना नीम तेल ही नहीं है तो फिर नीम कोटिंग कैसे हो रही है? बाकी का 85 फीसदी नीम तेल कहां से आ रहा है?

भारत में खेती के लिए बड़े पैमाने पर यूरिया का इस्तेमाल होता है। देश में यूरिया की सालाना खपत तकरीबन 3.15 करोड़ टन है जिसमें से 76 लाख टन यूरिया आयात होता है। नीम कोटिंग से यूरिया की खपत घटने की बात कही गई थी लेकिन हाल के वर्षों में यूरिया की खपत बढ़ी है। लिहाजा आयात भी बढ़ा है।

नीम कोटिंग में मिलावट?

नीम तेल के उत्पादन और खपत में भारी अंतर से संदेह पैदा होता है कि कहीं नकली नीम तेल का इस्तेमाल तो यूरिया में नहीं हो रहा है। यह आशंका अप्रैल, 2017 में उर्वरक मंत्रालय की ओर से जारी एक नोटिफिकेशन से पुख्ता होती है जिसमें कहा गया है कि कई नीम तेल सप्लायर यूरिया कंपनियों को नीम तेल की इतनी आपूर्ति कर रहे हैं जितनी उनकी उत्पादन क्षमता भी नहीं है। मंत्रालय ने नीम तेल सप्लायरों को ऐसा नहीं करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिनडाउन टू अर्थ की रिपोर्ट का दावा है कि सरकार के इस नोटिस के बावजूद नीम तेल में मिलावट बदस्तूर जारी है।

यह हाल तब है जबकि एक टन यूरिया में सिर्फ 600 ग्राम नीम तेल स्प्रे का मानक तय किया गया है जिसे कई विशेषज्ञ बहुत कम मानते हैं। इस मात्रा को बढ़ाकर 2 किलोग्राम करने की मांग भी उठ रही है। कहा जा रहा है है कि एक टन यूरिया में 2 किलोग्राम से कम नीम तेल के स्प्रे से मिट्टी या फसलों पर कोई खास फायदा नहीं पहुंचेगा। खैर, ये कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की बहस का मुद्दा हो सकता है कि लेकिन असली सवाल नकली नीम तेल की मिलावट और सरकारी दावे की असलियत का है। नीम तेल में मिलावट के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह भी अभी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस मिलावट को रोकने की कोई मजबूत नियामक व्यवस्था भी नहीं है।

नीम तेल आयात की तैयारी

लेकिन एक बात साफ है कि देश में नीम तेल की कमी है। जिसे दूर करने के लिए नीम तेल के आयात की सुगबुगाहट चल रही है। बहुत जल्द हम चीन या म्यांमार से नीम तेल आयात कर रहे होंगे। मतलब, चीन का विरोध करने के लिए चीनी फुलझंडी और पिचकारी के अलावा नीम तेल का भी बहिष्कार करना पड़ेगा।

उपाय क्या है?

बात ये है कि देश में जितने नीम के पेड़ हैं, उस हिसाब से नीम तेल का बाजार संगठित नहीं है। इसलिए इसे संगठित करने की जरूरत है। साथ ही नीम के पेड़ लगाने को भी प्रोत्साहन देना पड़ेगा। भारत का सबसे बड़े उर्वरक निर्माता इफको ने इस दिशा में पहल की है। इफको ने देश भर में निंबोली खरीद केंद्र बनाए हैं। गुजरात और राजस्थान में कहीं जगह निंबोली संग्रह जोर पकड़ रहा है। लेकिन नीम तेल में मिलावट के के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। अन्यथा,यूरिया की कालाबाजारी रोकने के चक्कर में नकली नीम तेल का कारोबार चमकने लगेगा।

किसानों की रसीद से नदारद गेहूं बोनस की रकम

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने गेहूं की खरीद पर केंद्र द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के अलावा अपनी तरफ से प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। इसके बावजूद बोनस की रकम का उल्लेख सरकारी खरीद की रसीद में नहीं है। इससे किसानों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि उन्हें बोनस मिलेगा भी या नहीं।

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों के मुद्दाें को जोरशोर से उठाया था, लेकिन सरकार बदलने के बावजूद सरकारी रवैये में ज्यादा बदलाव नहीं दिख रहा है। इस बात को गेहूं पर बोनस के मामले से समझा जा सकता है। कांग्रेस ने अपने वचन-पत्र में किसानों को बोनस देने का ऐलान किया था। पिछले महीने पांच मार्च को भोपाल में हुई प्रदेश कैबिनेट की बैठक में कमलनाथ सरकार ने गेहूं पर 160 रुपये और मक्का पर 250 रुपये प्रति क्विंटल बाेनस देने को मंजूरी दी थी। 25 मार्च से शुरू होकर 24 मई तक चलने वाली गेहूं की सरकारी खरीद में किसानों को 1840 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी के साथ 160 रुपए बाेनस भी दिया जाना था।

लेकिन सरकारी खरीद केंद्रों पर किसानों द्वारा बेचे जा रहे गेहूं के बाद दी जाने वाली रसीद पर  राज्य या केंद्र सरकार के किसी बाेनस का उल्लेख नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने गेहूं बोनस को लेकर असंमजस की स्थिति बनी हुई है। क्रय सोसायटी से दी जाने वाली पावती रसीद पर केंद्र और राज्य सरकार के बोनस की जगह शून्य लिखा है। ये शून्य किसानों की नाराजगी का सबब बना रहा है।

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसान

 

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसानमध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के टोड़ी गांव के किसान धनराज सिंह गुर्जर इस बारे में बताते हैं, “राज्य सरकार ने किसानों को समर्थन मूल्य पर गेहूं की तुलाई पर प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। लेकिन पावती रसीद पर न तो केंद्र सरकार का कोई बाेनस है न ही राज्य सरकार का। केवल जीरो लिखा है। किसानों को गुमराह किया जा रहा है। किसानों को सोयाबीन का 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस भी अभी नहीं मिला है।”

मध्य प्रदेश के जिस राजगढ़ में किसानों को इस समस्या का सामना करना पड़ा वहां की कलेक्टर निधि निवेदिता ने इस बारे में सरकार का पक्ष रखा है। उनका कहना है कि किसानों को पूरा बोनस दिया जा रहा है। वे कहती हैं, “सॉफ्टवेयर समस्या के कारण जो प्रिंट निकल रही थी उसमें बोनस नहीं दिख पा रहा था। जो भुगतान किसानों दिया गया है, उसमें 160 रुपये बोनस जोड़कर ही भुगतान हुआ है। अब सॉफ्टवेयर की समस्या को ठीक करवा दिया गया है जिससे समस्या नहीं होगी।”

खेती-किसानी पर चर्चा के बिना गुजरता चुनाव

राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याएं उठाने के साथ-साथ सरकार बनने के बाद उन समस्याओं को दूर करने का वायदा भी करते हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हिस्सेदारी कम होने के बावजूद खेती-किसानी आज भी भारत की आबादी को प्रत्यक्ष रोजगार देती है और अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक तथा सर्विस सेक्टर को कच्चा माल व बाजार उपलब्ध कराती है। रोजगार और बाजार को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली आर्थिक गतिविधि खेती-किसानी की समस्याएं और उनके समाधान के उपाय इस बार चुनावी चर्चा से यदि गायब नही हैं तो प्रमुखता में भी नही हैं।

अगर वर्ष 2014 से तुलना करें तो तब कृषि एवं किसानों के लिए भाजपा की चिन्ता व प्रतिबद्धता आज के मुकाबले अधिक दिखाई देती थी। सार्वजनिक सभाओं में नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार पर तंज करते हुए दोहराते थे कि कांग्रेस की नीति ‘मर जवान, मर किसान’ की हैं और यदि उनकी सरकार बनती है तो वे किसानो की बहुप्रतिक्षित मांग ‘स्वामीनाथन आयोग’ की संस्तुतियों को लागू कर किसानों को उनकी लागत पर 50% लाभ देंगे, कृषि बाजार में आमूल-चूल परिवर्तन कर बिचौलियों को कृषि बाजार से बाहर करेंगे, कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाएंगे, मध्यम एवं दीर्घकालिक सिंचाई योजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कर ‘पर ड्राप-मोर क्राप’ की व्यवस्था करेंगे।

2014 के चुनावों में किसानों ने भाजपा के वायदों पर भरोसा वोट दिए और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। लेकिन खेती और किसान सरकार की प्राथमिकता में नहीं आ पाए। मोदी सरकार ने मध्यप्रदेश सरकार को गेहूं पर दिए जा रहे बोनस को समाप्त करने के लिए लिखा तथा सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से बताया गया कि किसानों को लागत पर 50% लाभ देने वाली स्वामीनाथन कमेंटी की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं है।

सरकार के पहले दो वर्षों 2014-15 और 2015-16 में किसानों को सूखे का भी सामना करना पड़ा जिससे उसकी आमदनी प्रभावित हुई। लेकिन बाद के तीन वर्षों में रिकार्ड उत्पादन तथा सरकार की महंगाई नियन्त्रण की नीतियों के कारण किसानों की आमदनी में कमी आई। चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने स्वामीनाथन की रिपोर्ट के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का दावा तो किया लेकिन उससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उसकी गणना में भूमि का किराया सम्मिलित नही किया गया था।

मोदी सरकार की बड़ी-बड़ी घोषणाओं जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान सिंचाई योजना, मृदा स्वास्थ्य योजना, गन्ने का 14 दिनों में भुगतान आदि जमीन पर असफल होने के बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश एवं अन्य राज्यों में चुनाव जीतने के लिए कृषि ऋण माफी  का वायदा करना पड़ा। विभिन्न राज्यों में आधे-अधूरे तरीके से कृषि ऋण माफी योजना लागू भी की गई।

आखिरकार तमाम संरचनात्मक सुधारों को भूलकर भाजपा ने तेलंगाना और उड़ीसा सरकार के 2 हेक्टेयर तक जोत वाले किसानों के लिए 6000 रुपये/वार्षिक की प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना लागू कर चुनाव से पहले किसानों के खाते में 2000 रुपये हस्तांतरित करने का दांव चला। जो खेती-किसानी के मोर्चे पर सरकार की नाकामी को साबित करता है।

विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा सपा-बसपा-रालोद गठबंधन ने भी किसानों से कर्ज माफी का वायदा तो किया है लेकिन यह चुनाव भी खेती-किसानी पर बिना किसी गंभीर विमर्श और कार्य योजना के बिना गुजर रहा है।

(लेखक उत्तर प्रदेश योजना के पूर्व सदस्य और कृषि से जुड़े मामलों के जानकार हैं)

 

दिल में बसा गांव: आदमी बैल और सपने

अस्सी नब्बे के दशक तक ग्रामीण इलाकों में बैलगाड़ी का प्रयोग माल ढुलाई के अलावा घर की बहुओं को ससुराल पहुंचाने के लिये किया जाता था। बारात विदाई में लोकल पैसेंजर ट्रेन की भी शानदार भूमिका होती थी। भावी बहु अपने मैके से डोली में बैठकर रेलवे स्टेशन तक आती फिर डोली उठाने वाले कहार पैसेंजन ट्रेन की खिड़की के पास डोली को तजुर्बे से बांध देते।

जब ट्रेन गंतव्य पर पहुंचती पुन: कहार डोली को उतारकर प्लेटफार्म पर रखते और बहु एक बार फिर डोली में जाकर बैठ जाती। स्टेशन से बाहर निकलकर बताये स्थल पर पेड़ की छांव में बैलगाड़ी में बांस की कमानी से घेरा बना दिया जाता। एक जोड़ी बैल को जुआठ में बांधने के पहले उसके ऊपर से धोती-साड़ी या चांदनी जैसे मोटे कपड़े तान दिये जाते।

वर-वधु-सहबाला तीनों बारी-बारी से कमानी तने घरनुमा बैलगाड़ी पर सवार होते…उसके बार गाड़ीवान दोनों बैलों के कंधे पर जुआठ चढ़ाकर उनके गले को रस्सी से बांध देता….गाड़ीवान एक बार चलते के पहले दुल्हे से पूछता – सब ठीक से बैठ गये हैं न…दुल्हा की हामी के बाद गाड़ीवान पहले दाहिन बगल वाले बैल का पुट्ठा ठोकता या पैर के अंगुठा व मध्यमा उंगली से बैल के पांव के पिछले हिस्से को हल्के से ठोकता…इशारा पाते ही बैल कुछ दूर अनमने तरीके से चलने के बाद अपनी चाल रौ में चल पड़ते…बिना बोले दोनों बैल का आपसी तालमेल और उनके गले में बंधी घंटी की टन…टून…टन…टून….सुमधुर आवाज प्रकृतिक संगीत के आनंदलोक में विचरने को बाध्य करते। टूटी जर्जर सड़कों पर पहिये की खड़खड़ाहट, बांस की बाती से बने बेस एरिया की चरमराहट घंटियों के स्वर लहरियों से पूरी यात्रा में युगलबंदी करते अनूठा मंजर पेश करते।

अपने गांव/गंतव्य की यह यात्रा किस्से कहानियों में ही जिन्दा है अब। सड़कों के पक्कीकरण, विस्तार तथा आटो रिक्शा के आगमन से बैलगाड़ी गुजरे जमाने की सवारी होती चली गयी। हॉवर्ड को हॉर्डवर्क से चुनौती देने वाले चौकीदार को पता होना चाहिए कि ज्ञान बैल के अंदर भी होता है। मनुष्य ज्ञान का विभाजन विद्यागत विशिष्टता के लिये करता है, पशु के अंदर ऐसी चेतना का अभाव होता है।

रामशरण जोशी की एक किताब का शीर्षक था-आदमी बैल और सपने। हालांकि, उस किताब को मैंने पढ़ा नहीं है। इसी तरह बैल पर कवि शमशेर बहादुर सिंह की भी एक शानदार कविता है-

मैं वह गुट्ठल काली कड़ी कूबवाला बैल हूं

जो अकेले धीरे-धीरे छह मील खींचकर ले जाते हुये

ठेले के उपर लदा हुआ माल

स्टेशन से गोदाम तक 

चुपचाप धीरे-धीरे आंखे बाहर को निकली हुईं 

त्योरी चढ़ी हुई, कंधे जोर लगाते हुये

सीना और छाती आगे की ओर झुककर जोर लगाते हुये 

राने भरी हुईं गर्म पसीने से तर, मगर जोर लगती हुईं

आगे कविता में विडंबना बोध का स्वर गहराता है और बैल की स्वभाविक नाराजगी की अभिव्यक्ति में भी वह श्रम से भागता नहीं है। यथा-

वह गहरा लगातार श्रम 

पुट्ठों को श्लथ कर देनेवाला श्रम 

स्वंय मेरी नींद का कब्र बन जाता है 

मालिक पर तब जो मुझे गुस्सा आता है

उससे मेरा जोर और बढ़ जाता है

बैल का अक्स कवि केदारनाथ सिंह की कविता मांझी का पुल में भी प्रतिध्वनित होता है-जब खैनी बनाते लालमोहर को बैलों की सींग के बीच एन दिख जाता है मांझी का पुल….बैल मूक पशु है, लेकिन जैसी उपमा उसे (मूर्ख ) दी जाती है….वैसा वह है नहीं…मनुष्य सपना देख सकता है बैल नहीं…उसके वारिस मानव जात में कहीं ज्यादा मिल जायेंगे हमें।

साहित्यकार रामदेव सिंह अपने अतीत की स्मृतियों के झरोखे में विचरण करते हुये कहते हैं – जबसे होश संभाला साधन के रुप में बैलगाड़ी से रुमानी रिश्ता रहा। लगभग तीन दशकों तक। 1967 से 1971 तक जब हाईस्कूल में पढ़ रहा था। हास्टल में रहता था। छुट्टियों में यही बैलगाड़ी मुझे लाने भेजी जाती थी और हास्टल पहुंचाने भी। गांव भर में हमारी बैलगाड़ी सबसे सुंदर थी। नक्काशियों वाला टप्पर था। पर से टीन वाला चदरा, ताकि बारिश में सवार भींगे नहीं। टप्पर का इस्तेमाल जनाना सवारी के लिए ज्यादा होता था। अपनी शादी में ट्रेन पकड़ने के लिए मैं बैलगाड़ी से ही स्टेशन गया था।

चार दिनों बाद जब अपनी नववधू को विदाई करवा कर अपने स्टेशन पर उतरा तो यही बैलगाड़ी हमारे इन्तजार में खड़ी थी। रास्ते में जोर की आंधी आयी। बारिश होने लगी। संयोग से वहां एक प्राइमरी स्कूल था। इसी स्कूल में तीन घंटे शरण लेना पड़ा। आप कल्पना कर सकते हैं शहर में पली-बढ़ी नयी नवेली और बैलगाड़ी की वह सवारी, लेकिन उस दिन को हम बहुत रूमानियत के साथ याद करते हैं। बैलगाड़ी की सवारी के अनगिनत अनुभव हैं मेरे पास। 1982 में रेल की नौकरी में आने के बाद भी 1990-91 तक मैं रेलवे स्टेशन से गांव आने-जाने के लिए शौकिया बैलगाड़ी मंगवाया करता था।

मोहन लाल यादव बताते हैं कि हमारे यहां इलाहाबाद में जब कुंभ मेला लगता था तो गंगा किनारे के निकटवर्ती गांव बैलगाड़ी और इक्कों से भर जाते थे। यूपी के पूरब और पूर्वोत्तर जिले जैसे गोरखपुर, जौनपुर, आजमगढ़ तथा गाजीपुर तक के तीर्थ यात्री बैलगाड़ियों से ही आते थे। वे महीनों पहले से ही यात्रा शुरू कर देते थे। रास्ते पर वे गाते बजाते चले आते थे। रात्रि किसी बाग में अथवा किसी सराय में रुकते। बचपन में हम उनके पास रात में किस्से सुनने जाते थे।

संस्कृतिकर्मी जावेद इस्लाम अपने बचपन को याद करते हुये बताते हैं कि मेरा घर जीटी रोड पर है। बचपन में सामान्य बच्चों की तरह हम भी सड़क पर गुजरने वाले बैल गाड़ी पर दौड़ के पीछे लटक जाते थे और मजा लेते हुये कुछ दूर तक जाते फिर उतर जाते थे। मजा तो तब आता था जब बैल गाड़ी पर दूल्हा व घूंघट में दुल्हनियां जा रही होती थी। बैलगाड़ी के पीछे कपड़ेे का पर्दा लगा होता था। हम बच्चे शोर मचाते बैल गाड़ी के पीछे भगते थे, पर्दा उठा कर दूल्हा-दुल्हन की एक झलक पाने के लिये। गाड़ी मान सोटा दिखाकर या हल्के तरीके से सटाकर कर हम बच्चों को भगाता था। वे भी क्या दिन थे?

आकाशवाणी के पूर्व कार्यक्रम अधिशासी अनिल किशोर सहाय बचपन की स्मृतियों में डूबकर बताते हैं कि हम भी बचपन में बैलगाड़ी में सवार होकर ननिहाल जाते थे। बस से सड़क पर उतरने के बाद आठ किलोमीटर का सफर कच्चे रास्ते की सवारी बैलगाड़ी के जरिये ही तय करते थे। मेरी मां कुछ जरूरी चीजें बैलगाड़ी में रख लेती और हम पैदल खेतों के रास्ते…. क्या दिन थे… रास्ते में एक छोटी नदी भी पड़ती थी, पर गाड़ीवान इतना सिद्धहस्त था कि वह जोर से हकारते हुये नदी पार….. अब सब सपना सा लगता है। वहां पक्की सड़क बन गयी है और गांव तक बस जाने लगी है। पूर्वोत्तर भारत का मुझे नहीं पता, लेकिन शेष भारत में बैलगाड़ी कृषि कार्यों में अनाज ढूलाई के अलावा आवागमन का एक महत्वपूर्ण साधन था। जिसके दरवाजे पर दो तीन थोड़ी बैल हों उसे अच्छा कृषक माना जाता था।

बहरहाल, दौर बदल रहा है और बदलते वक्त की रफ्तार में बैलगाड़ी पीछे छूट चुकी है। लेकिन शहर के बियाबान में भी उस गांव की याद तो आती है जो दिल के किसी कोने में बसा है। वहां बैलगाड़ी के चलने और बैलों के झूमने का संगीत हमेशा सुनाई देता रहेगा।

 

 

चुनावों में कहां गायब है किसान आंदोलनों की आवाज?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यह दावा करते हुए नहीं थकती है कि उसने पिछले पांच सालों में किसानों के कल्याण के लिए काफी काम किए हैं। भारतीय जनता पार्टी की यह सरकार ये भी कहती है कि पहली बार किसानों की आय दोगुनी करने का एक लक्ष्य तय किया गया। किसानों के लिए उठाए गए कई कदमों का उल्लेख नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार करती आई है।

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि पिछले पांच सालों में पूरे देश में सबसे अधिक किसान आंदोलन हुए। ये आंदोलन किसी एक राज्य या कुछ खास राज्यों तक सीमित नहीं रहे हैं। बल्कि उन सभी राज्यों में किसान आंदोलन पिछले पांच सालों में हुए हैं, जिन राज्यों को सामान्य तौर पर कृषि प्रधान राज्य माना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को आम तौर पर औद्योगिक केंद्र माना जाता है लेकिन इन राज्यों में भी किसानों ने बीते सालों में आंदोलन किए।

किसान आंदोलनों के लेकर कुछ ऐसा माहौल बना कि देश भर में काम करने वाले कई अलग-अलग किसान संगठन एक मंच पर आए। इन सभी ने मिलकर संयुक्त तौर पर संघर्ष करने का निर्णय लिया। इन लोगों ने अपनी मांगों में एकरूपता लाई। सभी जगह के किसान आंदोलनों में उचित मूल्य, कर्ज माफी और लागत में कमी की बात समान रूप से आई।

इसके बावजूद किसान आंदोलनों की गूंज लोकसभा चुनावों में सुनाई नहीं दे रही है। इसकी वजहों के बारे में पता लगाने के लिए जब कृषि के जानकारों, इन आंदोलनों में शरीक रहे लोगों और राजनीतिक विशेषज्ञों से बात करें तो कई बातें उभरकर सामने आती हैं।

सबसे पहली बात तो यह बताई जा रही है कि आजादी के बाद से अब तक जितने भी लोकसभा चुनाव हुए हैं, उनमें से किसी भी चुनाव में कृषि और किसान के मुद्दे केंद्र में नहीं रहे हैं। खेती-किसानी एक मुद्दा तो रहा है लेकिन यह मूल मुद्दा कभी नहीं रहा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि यह कभी ऐसा मुद्दा नहीं रहा है जिस पर वोटों का धु्रवीकरण किया जा सके।

कृषि विशेषज्ञ और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसान एक वर्ग के तौर पर भारत में एकजुट नहीं रहा है। इन लोगों का कहना है कि अगर किसान को एक वर्ग मानें तो इसके अंदर कई उपवर्ग हैं। जाति का उपवर्ग है, धर्म का उपवर्ग, भाषा का उपवर्ग है और क्षेत्र का उपवर्ग है। लेकिन इन लोगों का ये कहना है कि ये उपवर्ग चुनावों में किसानों के मुख्य वर्ग बन जाते हैं और किसान वर्ग खुद उपवर्ग बनकर पीछे छूट जाता है।

इसका मतलब यह हुआ कि एक किसान जब वोट देने जाता है तो उस वक्त वह बतौर किसान नहीं वोट देता है बल्कि चुनावी राजनीति में वोट देने का उसका निर्णय उसकी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से अधिक प्रभावित होती है। ऐसे में खेती-किसानी के मुद्दे उठते तो रहते हैं लेकिन चुनावों के मूल मुद्दे नहीं बन पाते।

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के राजनीतिक दलों को यह मालूम है कि किसान खुद को किसानों का एक वर्ग मानकर मतदान नहीं करता। इसलिए वे किसानी के मुद्दों को मूल मुद्दा नहीं बनाते हैं। क्योंकि अगर खेती-किसानी के मुद्दे मूल मुद्दे बन गए तो उन्हें नुकसान अधिक होगा।

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि खुद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहते कि किसान एक वर्ग के तौर पर उभरे। इसकी वजह बताते हुए ये लोग कहते हैं कि देश के 57 फीसदी लोग अब भी कृषि पर जीवनयापन के लिए निर्भर हैं। अगर किसी तरह से इन 57 फीसदी लोगों का एक वर्ग बन गया और ये एक वोट बैंक की तरह वोट देने लगे तो फिर ये होगा कि किसान जैसी सरकार चाहेंगे, वैसी सरकार बनेगी। सारी नीतियां किसानों के हिसाब से बनेगी।

इसका एक असर यह भी होगा कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवार भी टूटेगी। इससे वोट बैंक की मौजूदा राजनीति को झटका लगेगा और राजनीतिक दलों को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।

इन लोगों का यह भी कहना है कि यह उद्योग जगत भी नहीं चाहता कि किसान एक वर्ग के तौर पर एकजुट हो जाएं। क्योंकि इन्हें लगता है कि अगर ऐसा हो गया तो फिर सरकारी नीतियों को जिस तरह से वे अपने फायदे के लिए प्रभावित कर पा रहे हैं, उस तरह से वे प्रभावित नहीं कर पाएंगे और किसानों के हिसाब से सारी सरकारी नीतियां बनने लगेंगी।

ऐसे में स्थिति ये दिखती है कि किसानी के सवालों को मूल चुनावी मुद्दा बनाने के पक्ष में चुनाव प्रक्रिया में अधिकांश हितधारक नहीं हैं। इसलिए हाल के सालों में किसान आंदोलनों की देशव्यापी गूंज के बावजूद लोकसभा चुनावों में इनकी धमक नहीं सुनाई दे रही है।

मौसम की मार से कैसे बचाएंगे सरकार के गोलमोल पूर्वानुमान?

पिछले तीन-चार दिनों के दौरान राजस्‍थान, गुजरात और मध्‍य प्रदेश समेत देश के कई इलाकों में बेमौसम बारिश, आंधी-तूफान और ओलावृष्टि से कम से कम 57 लोगों की जान चली गई। मध्‍य प्रदेश में 22, राजस्‍थान में 25 और गुजरात में 10 लोगों के मारे जाने की खबर है। तैयार फसलों पर मौसम की मार कहर बनकर टूटी है। किसानों की तबाही और मंडियों  में भीगते अनाज की दिल दुखाने वाली तस्‍वीरें सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 21वी सदी में किसानों को मौसम की मार से बचाने का कोई उपाय नहीं है?

मौसम अक्सर किसान का ऐसे ही इम्तिहान लेता है। लेकिन जिस दौर में सरकार अंतरिक्ष में सर्जिकल स्ट्राइक की वाहवाही लूट रही है, क्या मौसम का सही पूर्वानुमान लोगों तक नहीं पहुंचना चाहिए?

फिलहाल किस तरह के मौसम पूर्वानुमान लोगों तक पहुंच रहे हैं, जरा गौर कीजिए

मौसम विभाग ने अगले पांच दिनों यानी 18 अप्रैल से 22 अप्रैल के लिए देश के कई हिस्सों में बारिश, आंधी, गरज-चमक और ओलावृष्टि की चेतावनी जारी की है।

18 अप्रैल के लिए जारी चेतावनी में कहा गया है कि तमिलनाडु, रायलसीमा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, केरल, दक्षिणी कर्नाटक, तटीय आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और त्रिपुरा के अलग-अलग इलाकों में आंधी-तूफान से साथ बिजली गरज सकती है।

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इस अनुमान से कोई क्या समझेगा? तकरीबन आधे भारत के अलग-अलग इलाकों में, कहीं-कहीं आंधी-तूफान, गरज-चमक की चेतावनी दी गई है। इसी तरह 22 अप्रैल को राजस्थान के कुछ इलाकों में हीट वेव यानी लू चलने की चेतावनी है। इन कुछ इलाकों में कौन-कौन से इलाके आते हैं, मौसम विभाग ही जाने!

करीब 3.42 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले राजस्थान के कुछ इलाकों में लू चलने के अनुमान से किसी को क्या समझ आएगा? ऐसे अस्पष्ट और अनिश्चित अनुमान मौसम विभाग की साख पर तो बट्टा लगा ही रहे हैं साथ ही मौसम पूर्वानुमान की गंभीरता और विश्वसनीयता को भी कमजोर कर रहे हैं।

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मौसम के अचानक करवट बदलने और उत्तर, मध्य व पश्चिमी भारत के राज्यों में बेमौसम बारिश, आंधी-तूफान और ओलावृष्टि के  लिए पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के ऊपर उत्पन्न  Western Disturbance यानी पश्चिमी विक्षोभ को वजह बताया जा रहा है।

मौसम विभाग का अनुमान है कि 22 अप्रैल से एक नया पश्चिमी विक्षोभ पश्चिमी हिमालय क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इसका असर हिमाचल प्रदेश में होगा या उत्तराखंड में यह अभी स्पष्ट नहीं है। जिलेवार जानकारी मिलना तो दूर राज्यवार भी मौसम के पूर्वानुमान बहुत सटीक नहीं हैं।

23 और 25 अप्रैल के बारे में मौसम विभाग का वेदर आउटलुक बताता है कि पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के बहुत से इलाकों और पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वी भारत में कहीं-कहीं बारिश या गरज-बौछार की संभावना है। जबकि उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानों और दक्षिणी प्रायद्वीप में कहीं-कहीं बारिश या गरज-बौछार हो सकती है। देश के बाकी हिस्सों में मौसम शुष्क रहेगा। अब आप पता कीजिए कि उत्तर, पूर्वी, पश्चिमी भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप के अलावा देश में कौन-से हिस्से बचते हैं जहां मौसम शुष्क रहेगा।

मध्य प्रदेश या राजस्थान के किसी गांव में बैठे व्यक्ति को ऐसे पूर्वानुमान से कैसे अंदाजा लगेगा कि उसके जिले में बारिश की संभावना है या नहीं?

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इसी तरह 18 अप्रैल के बारे में मौसम विभाग का अनुमान था कि पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल में कहीं-कहीं बारिश हो सकती है। यूपी में ही 75 जिले हैं। सहारनपुर से बलिया तक 1000 किलोमीटर की दूरी है। ऐसे में गोलमोल पूर्वानुमानों का मतलब?

मौसम के तमाम अनुमान “कहीं-कहीं”, “अलग-अलग”, “कुछ-कुछ” इलाके जैसे शब्दों से बयान होते हैं जिससे सटीक अनुमान लगाना बेहद मुश्किल है। 

संभवत: गलत साबित होने से बचने के लिए मौसम विभाग इतने अस्पष्ट और गोलमोल अनुमान पेश करता है। दीर्घअवधि पूर्वानुमानों को लेकर मौसम विभाग पर काफी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कम अवधि के अनुमान भी बहुत सटीक या उपयोगी नहीं हैं।

उदाहरण के तौर पर, 4 अप्रैल को जारी वेदर आउटलुक में मौसम विभाग ने 11 से 17 अप्रैल के बीच पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, उत्तरी केरल में सामान्य से अधिक जबकि दक्षिणी केरल, दक्षिणी तमिलनाडु, पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से कम और देश के बाकी हिस्सों में सामान्य बारिश की संभावना जताई थी।

जाहिर है कि 15 से 17 अप्रैल के दौरान गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में आंधी-तूफान, ओलावृष्टि और बारिश का मौसम विभाग के 4 अप्रैल को जारी आउटलुक से बहुत अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। क्योंकि यह अनुमान बहुत जेनरिक था।

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हालांकि, 14 और 15 अप्रैल को मौसम विभाग ने पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के कुछेक इलाकों में भारी बारिश या ओले पड़ने की चेतावनी जारी की थी। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के कुछ इलाकों में भी आंंधी-तूफान, ओलावृष्टि के साथ हल्की से सामान्य बारिश की संभावना जताई गई। गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, मराठवाडा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी गरज-चमक और अंधड़ के साथ कहीं-कहीं बारिश और बिजली गिरने का अलर्ट था।

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लेकिन एक तो यह चेतावनी 14 और 15 अप्रैल को तब जारी की गई जब मौसम की मार पड़ने लगी थी। मंडियों में पड़े अनाज या कट चुकी फसलों के बचाव के लिए ज्यादा समय नहीं था। दूसरा, इस चेतावनी में राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में ओलावृष्टि होने का जिक्र नहीं था। पंजाब, हरियाणा में ओलावृष्टि की आशंका ज़रूर जताई गई थी।

सब जानते हैं देश की अर्थव्यवस्था किस हद तक मौसम पर निर्भर है। किसान के अलावा कई दूसरे काम-धंधों और जान-माल की सुरक्षा के लिए समय रहते मौसम की सटीक जानकारी मिलना जरूरी है। लेकिन यहां तो मौसम के सारे अनुमान गोलमोल तकनीकी शब्दावली की भेंट चढ़ते दिख रहे हैं।

सबसे बड़ा सवालिया निशान भारत सरकार के उस मौसम विभाग पर है जिस पर प्राइवेट एजेंसियों के अनुमान भी कई बार भारी पड़ जाते हैं।

हरियाणा में सरसों खरीद को लेकर किसान नाराज क्यों हैं?

हरियाणा में सरसों पैदा करने वाले किसान गुस्से में हैं। पिछले कई दिनों से इन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरसों की सरकारी खरीद को लेकर हरियाणा के किसानों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

हरियाणा में इस साल सरसों की अच्छी पैदावार हुई है। इसके बावजूद सरसों किसानों को अपनी फसल के बदले उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार ने इस सीजन के लिए सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन किसानों को इस दर से प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये कम मिल रहे हैं।

दूसरी समस्या यह हो रही है कि किसानों की कुल पैदावार की सरकारी खरीद हरियाणा के मंडियों में नहीं हो पा रही है। सरकार ने अधिकतम खरीद की सीमा तय कर रखी है। यह सीमा प्रति एकड़ 6.5 क्विंटल की है। लेकिन हरियाणा से यह जानकारी मिल रही है कि इस साल वहां प्रति एकड़ औसतन 10 से 12 क्विंटल सरसों का उत्पादन हुआ है।

इस लिहाज से देखें तो किसानों से उनकी सरसों की कुल पैदावार को मंडियों में नहीं खरीदा जा रहा है। इसके अलावा मंडियों में एक दिन में एक किसान से 25 क्विंटल सरसों खरीदने की अधिकतम सीमा भी तय की गई है। इन दोनों वजहों से किसानों को खुले बाजार में औने-पौने दाम में सरसों बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है।

पिछले दिनों स्वराज इंडिया पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव ने हरियाणा की कुछ मंडियों का दौरा करके सरसों किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया है कि किसानों से खरीदी जा रही सरसों की फसल की तौल में भी किसानों के साथ धोखा किया जा रहा है। उनका आरोप है कि हर बोरी पर किसानों की फसल लूटी जा रही है। योगेंद्र यादव ने सरकार से मांग की कि इस समस्या को दूर करने के साथ खरीद पर तय की गई अधिकतम सीमा तत्काल हटाई जानी चाहिए।

सरसों किसानों की समस्या बढ़ाने का काम खरीद एजेंसी में बदलाव की वजह से भी हुआ है। पहले हरियाणा में सरसों खरीद का काम नैफेड और हैफेड के माध्यम से किया जा रहा था। लेकिन इन एजेंसियों का खरीद लक्ष्य पूरा हो गया। जबकि मंडियों में सरसों की आवक जारी रही। इस वजह से अब सरसों खरीद का काम खाद्य एवं आपूर्ति विभाग को दिया गया है। खरीद एजेंसी में हुए इस बदलाव से हरियाणा के विभिन्न मंडियों में अव्यवस्था बनी हुई है।

एजेंसी बदलने की वजह से किसानों को नए सिरे से रजिस्ट्रेशन कराना पड़ रहा है। क्योंकि बगैर रजिस्ट्रेशन के किसानों की सरसों नहीं खरीदने का प्रावधान किया गया है। एजेंसी में बदलाव किए जाने की वजह से खरीद प्रक्रिया ठीक से चल नहीं रही है। प्रदेश में कुछ जगहों पर तो नाराज किसानों ने हंगाम भी किया। कुछ जगहों पर किसानों ने सड़क जाम भी किया।

बहादुरगढ़ की मंडी में सरसों किसानों को हंगाम करने का बाध्य होना पड़ा तब जाकर सरसों खरीद शुरू हो सकी। बहादुरगढ़ मंडी में खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ही गेहूं की खरीद भी कर रहा है। इस वजह से न तो मंडी में विभाग के पर्याप्त कर्मचारी थे और न ही कोई उपयुक्त व्यवस्था बन पाई।

हरियाणा की मंडियों में सरसों की सरकारी खरीद ठीक से नहीं होने की वजह से कुछ मंडियों में सरसों से लदे ट्रालियों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। रेवाड़ी में नाराज सरसों किसानों ने सड़क जाम किए। यहां किसानों से सरसों की खरीद ही शुरू नहीं हो पा रही थी। जबकि उन्हें सरसों खरीदने से संबंधित टोकन जारी हो गया था।

सरसों किसानों को इन समस्याओं का सामना तब करना पड़ा है जब केंद्र सरकार में बैठे नीति निर्धारक तिलहन के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने और खाद्य तेलों का आयात कम करने की बात लगातार कर रहे हैं। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने दोबारा सत्ता में आने के बाद तिलहन मिशन शुरू करने का वादा किया है। मार्च, 2019 में भारत ने 14.46 लाख टन खाद्य और अखाद्य तेलों का आयात किया।

एक तरफ भारी आयात है तो दूसरी तरफ देश में हो रहे उत्पादन की खरीदारी ठीक से नहीं हो रही है। ऐसे में क्या ये किसान फिर से सरसों उपजाने का निर्णय लेंगे? अगर ये फिर से सरसों नहीं उपजाते हैं या उपजाते भी हैं तो अगर सरसों की खरीद ठीक ढंग से नहीं हो पाती है तो क्या देश को तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का सपना पूरा हो पाएगा।

किसानों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के दावों में कितना दम?

देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर अपने घोषणापत्र जारी कर दिए हैं। आम तौर पर यह माना जा रहा था कि दोनों पार्टियां अपने घोषणापत्र में इस बार किसानों को लेकर बड़े वादे करेंगी। ऐसा इसलिए माना जा रहा था क्योंकि पिछले दो सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े किसान आंदोलन हुए और किसानों की बुरी स्थिति बार-बार सामने आई।

उम्मीद के मुताबिक दोनों दलों ने अपने घोषणापत्र में किसानों के लिए कई वादे किए हैं। इन वादों की हकीकत क्या है, उसे जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि अगर पूरे भी हुए तो इससे किसानों की स्थिति में क्या सुधार होगा।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह किसानों को ‘कर्ज माफी’ से ‘कर्ज मुक्ति’ की राह पर ले जाएगी। इसके लिए पार्टी ने कहा है कि वह किसानों को उपज के बदले लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करेगी। साथ ही कांग्रेस ने यह भी कहा कि कांग्रेस की सरकार अगर बनी तो लागत में कमी लाया जाएगा और किसानों को संस्थागत कर्ज मिले, यह सुनिश्चित किया जाएगा। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस की कर्ज मुक्ति की बात को पूरा करने के लिए पार्टी ने सांकेतिक तौर पर ही सही, एक रोडमैप बताया है। हालांकि, लाभकारी मूल्य कैसे सुनिश्चित होगा और लागत में कैसे कमी आएगी, इस पर कांग्रेस ने स्थितियों को साफ नहीं किया है।

कांग्रेस ने देश के किसानों से यह वादा भी किया है कि केंद्र की सत्ता में आने के बाद उसकी सरकार हर साल अलग से ‘किसान बजट’ पेश करेगी। इसके जरिए कृषि क्षेत्र पर उसकी जरूरतों के हिसाब से विशेष जोर दिया जा सकेगा। इससे किसानों के मुद्दों पर लोगों का ध्यान तो जाएगा लेकिन अलग बजट किसान और खेती की समस्याओं का समाधान नहीं है। रेलवे के लिए आजादी से लेकर हाल तक अलग बजट पेश किया जाता था लेकिन इससे रेलवे की सेहत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। न ही अब इसका विलय आम बजट में करने से हो रहा है। इसका मतलब यह है कि अलग बजट भर कर देने से किसी समस्या के समाधान की कोई गारंटी नहीं है। असल जरूरत समस्या के समाधान को लेकर नीयत की है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया सरकार बनाने के बाद वह एक कृषि के लिए एक स्थायी आयोग बनाएगी। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय कृषि विकास एवं योजना आयोग नाम दिया है। कांग्रेस ने कहा है कि इस आयोग में किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्रियों को शामिल किया जाएगा। ये आयोग सरकार को बताएगी कि कृषि को कैसे फायदेमंद बनाया जाए। घोषणापत्र में यह कहा गया है कि इस आयोग की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव भी दिया है कि यही आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करेगा।

यह एक सांस्थानिक हस्तक्षेप होगा। अगर कांग्रेस की सरकार बनती है और अगर वह यह काम कर देती है तो इससे दीर्घकालिक तौर पर कृषि और किसानों की समस्याओं के समाधान में मदद मिलेगी। यह प्रस्ताव तो ऐसा है जिस पर किसी भी सरकार को अमल करना चाहिए। दरअसल, देश में किसानों की स्थिति सुधारने के लिए जो उपाय हुए हैं, उनमें अधिकांश तात्कालिक ही रहे हैं। ऐसे में अगर इस आयोग को बनाने का सांस्थानिक काम होता है तो इससे किसानों का लंबे समय तक लाभ मिलेगा और इससे कृषि को जो मजबूती मिलेगी, उसका लाभ देश की अर्थव्यवस्था को होगा। ऐसे ही सीमांत किसानों के लिए एक नया आयोग बनाने का कांग्रेस का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को भी संशोधित करने की बात कही है। पार्टी ने कहा है कि अभी यह योजना किसानों की कीमत पर बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचा रही है। इस बीमा योजना के क्रियान्वयन में खामी का संकेत भाजपा के घोषणापत्र से भी मिलता है। भाजपा ने भी कहा है कि वह इस योजना को स्वैच्छिक बनाएगी। इसके बाद से कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जिन खामियों की ओर वे लगातार संकेत कर रहे थे, अब उसे खुद इस योजना को लागू करने वाली पार्टी ने मान लिया है।

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का जो लक्ष्य रखा है उसे पूरा करने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे। पहली बार इसकी घोषणा 2016-17 के बजट में हुई थी। लेकिन तब से लेकर हाल में भाजपा के घोषणापत्र जारी करने तक, कभी भी यह रोडमैप देश के सामने नहीं रखा गया जिस पर चलकर इस लक्ष्य को हासिल किया जाना है। इस वजह से अब तो आम लोगों को भी 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर संदेह होने लगा है।

चुनावों से ठीक पहले मोदी सरकार ने दो हेक्टेयर तक जमीन वाले किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत हर परिवार को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता मिलनी है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि जीतने के बाद वह इस योजना का दायरा बढ़ाकर इसे देश के सभी किसानों के लिए लागू करेगी। भाजपा लगातार कांग्रेस की प्रस्तावित ‘न्याय’ योजना पर सवाल उठा रही जिसके तहत देश के सबसे गरीब परिवारों को 72,000 सालाना की आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव है। भाजपा की ओर से कहा जा रहा है कि इसके लिए पैसे कहां हैं। लेकिन भाजपा खुद यह जवाब नहीं दे रही है कि पीएम-किसान के तहत हर किसान परिवार को प्रति वर्ष वह 6,000 रुपये कहां से देगी।

भाजपा ने यह घोषणा भी की है कि वह छोटे और सीमांत किसानों के लिए पेंशन की योजना लाएगी जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस पेंशन के लिए किसानों को एक निश्चित अंश दान करना होगा या फिर उन्हें कोई आर्थिक योगदान नहीं देना होगा और यह काम खुद सरकार करेगी। क्योंकि इस सरकार ने कई पेंशन योजनाएं ऐसी लाई हैं जिनमें लाभार्थियों को भी अंशदान करना है। इसलिए किसानों के लिए प्रस्तावित पेंशन योजना पर भााजपा और स्पष्टता रखती तो ज्यादा ठीक रहता।

भाजपा ने घोषणापत्र में किसानों से यह वादा भी किया है कि वह यह सुनिश्चित करेगी कि किफायती दरों पर बेहतर बीज किसानों को समय पर उपलब्ध हो सकें और घर के पास ही उनकी जांच की सुविधा उपलब्ध हो। लेकिन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के बढ़ते दबदबे के बीच यह काम कैसे किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टता नहीं है।

तिलहन के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के मकसद से भाजपा ने नए तिलहन मिशन की शुरुआत करने का वादा भी किया है। इसे लागू करने का रोडमैप तो नहीं बताया गया है लेकिन अगर यह मिशन ठीक से लागू हो तो इससे देश का काफी भला होगा। क्योंकि खाद्य तेल के मामले में आयात पर निर्भरता की वजह से देश को कई स्तर पर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

इसके अलावा भाजपा ने पूरे देश में कृषि भंडारण की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए यह वादा किया है कि वह पूरे देश में वेयरहाउस का नेटवर्क विकसित करेगी। भाजपा ने इस संदर्भ में अपने संकल्प पत्र में कहा है, ‘किसानों को अपनी उपज का भंडारण अपने गांव के निकट करने तथा उचित समय पर उसे लाभकारी मूल्य पर बेचने के लिए सक्षम करने के उद्देश्य से हम कृषि उत्पादों के लिए नई ग्राम भंडारण योजना आरंभ करेंगे। हम कृषि उत्पादों की भंडारण रसीद के आधार पर किसानों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराएंगे।’ अगर सही ढंग से इसे लागू कर दिया जाए तो यह भी कृषि में दीर्घकालिक बदलाव लाने वाला कदम साबित होगा। क्योंकि गांवों के स्तर पर भंडारण एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है।

देखा जाए तो देश की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में किसानों के लिए कई उपयोगी घोषणाएं हैं। लेकिन अधिकांश घोषणाओं के साथ यह नहीं बताया गया है कि इसे कैसे पूरा किया जाएगा। इस वजह से इन चुनावी घोषणाओं पर किसानों को बहुत भरोसा नहीं हो रहा है। अच्छा तो यह होता कि हर घोषणा के साथ ये पार्टियां उसे लागू करने की कार्ययोजना भी बतातीं। इससे लोगों में इन बातों को लेकर विश्वास भी आता और फिर इस आधार पर लोग उन्हें वोट भी देते।

एक चौथाई स्वास्थ्य केंद्रों पर पर्याप्त पानी भी नहीं!

सरकारें स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का बखान करते हुए नहीं थकती हैं। केंद्र की मौजूदा सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए कार्यों का हवाला देते हुए सरकार एक सांस में कई योजनाएं गिना देती है और फिर अंत में यह भी कहती है कि उसने नई स्वास्थ्य नीति 2017 में लाई और इसके तहत पूरे देश में 1.5 लाख वेलनेस केंद्र खोले जाने हैं और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बढ़ाया जाना है। सरकार बीमा आधारित स्वास्थ्य योजनाओं को भी अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती है।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि आज भी स्वास्थ्य केंद्र बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना कर रहे हैं। इस वजह से यहां आने वाले लोगों का ठीक से ईलाज नहीं हो पा रहा। वहीं दूसरी तरफ बीमा आधारित योजनाओं का लाभ उठाकर निजी अस्पताल अपना कारोबार विस्तार लगातार कर रहे हैं।

इस भयावह स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी देने वाली एक रिपोर्ट हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तैयार की है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए वैश्विक स्तर पर अध्ययन किया गया। इसमें यह बताया गया है कि दुनिया के 25 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पर्याप्त पानी भी उपलब्ध नहीं है। वहीं 20 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां साफ-सफाई के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस वजह से दुनिया के दो अरब से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर मेडिकल कचरे को अलग-अलग करने और फिर उनके निस्तारण के लिए भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कम विकसित देशों में यह स्थिति और भी बुरी है। इन देशों में 45 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ऐसे केंद्रों पर हर साल 1.7 करोड़ महिलाएं अपने बच्चों को जन्म देती हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर किसी बच्चे का जन्म ऐसी जगह पर हो जहां न तो पर्याप्त पानी हो और न ही पर्याप्त साफ-सफाई तो बच्चे और मां पर कई बीमारियों के साथ-साथ जान से हाथ धोने का खतरा भी बना रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस वजह से हर साल तकरीबन दस लाख मौतें हो रही हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पानी और साफ-सफाई में कमी की वजह से नवजात बच्चों और बच्चों को जन्म देनी वाली महिलाओं में जो संक्रमण होता है, उससे सबसे अधिक प्रभावित कम विकसित देश और विकासशील देश हैं।

नवजात बच्चों की कुल मौतों में इस वजह से होने वाली मौतों की हिस्सेदारी 26 फीसदी है। जबकि बच्चों के जन्म देने या इसके थोड़ी ही समय बाद पूरी दुनिया में जितनी महिलाओं को जान गंवानी पड़ रही है, उसमें पर्याप्त पानी और साफ-सफाई के अभाव के माहौल में बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 11 फीसदी है।

भारत के भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर पानी और साफ-सफाई का अभाव स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। अगर भारत के संदर्भ में इस तरह का कोई अध्ययन हो तो इससे भी कहीं अधिक भयावह आंकड़े सामने आ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों का तो और भी बुरा हाल है। यहां तक की प्रमुख शहरों के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त पानी और साफ-सफाई नहीं है। दूसरी बुनियादी सुविधाओं की भी यही स्थिति है।

ऐसे में इस दिशा में काम होना चाहिए कि कैसे भारत के स्वास्थ्य केंद्रोें पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। क्योंकि यह एक स्थापित तथ्य है कि जिस भी समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य की बुरी स्थिति रहती है, वह समाज न तो आर्थिक तौर पर अच्छा प्रदर्शन कर पाता है और न ही मानव विकास के पैमाने पर उसका प्रदर्शन सुधरता है।

कटहल खाने पर छिड़ा विवाद, ब्रिटेन के अखबार ने बताया भद्दा

कटहल खाने को सेहत के लिए कई लिहाज से फायदेमंद माने जाता है। लेकिन ब्रिटेन के प्रमुख अखबारों में शुमार किए जाने वाले ‘दि गार्डियन’ अखबार में 27 मार्च, 2019 को कटहल से संबंधित एक लेख प्रकाशित हुआ। इसे लिखा है जो विलियम्स ने। विलियम्स ने अपने लेख में कटहल को भद्दा और बदसूरत बताया गया है।

जो विलियम्स ने इस लेख में यह भी कहा है कि भारत के लोग इस फल को पेड़ों पर सड़ने के लिए छोड़ देते थे। उनका कहना है कि भारत में सिर्फ वही लोग खाते थे जिनके पास इससे बेहतर खाने के लिए कुछ नहीं होता था।

लेखक ने यह भी कहा है कि भारत में लोग पहले इसे नहीं खाते थे और अब लोग मांस के विकल्प के तौर पर इसे खा रहे हैं। लेखक ने कहा है कि कटहल की अब लाॅटरी लग गई है। विलियम्स ने यह भी दावा किया है कि पांच साल पहले तक कटहल उपजाया भी नहीं जाता था। लोग इसे पेड़ों पर सड़ने के लिए छोड़ देते थे लेकिन अब भारत से इसका निर्यात हो रहा है।

दि गार्डियन के इस लेख में कटहल से संबंधित कई तथ्यात्मक गलतियां हैं। लेखक ने कटहल को फल बताया है। लेकिन भारत में कटहल का इस्तेमाल सब्जी के तौर पर होता आया है। कटहल वैसे लोग नहीं खाते आए हैं, जिनके पास खाने को कुछ नहीं था बल्कि इसे सामान्य लोग ही खाते आए हैं।

सामान्यतः एक सब्जी के तौर पर बाजार में दूसरी सब्जियों के मुकाबले कटहल की कीमत अधिक होती है। इससे पता चलता है कि कटहल विकल्पहीनता की सब्जी नहीं बल्कि शौक की सब्जी रही है। उत्तर भारत में होली के त्योहार पर अधिकांश घरों में कटहल की सब्जी बनती है। कटहल का अचार भी लोग बहुत पसंद से खाते हैं।

इस लेख को लेकर ‘दि गार्डियन’ और लेखक को सोशल मीडिया पर काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोग इसे ब्रिटेन के अखबार की ओर से खाने-पीने की चीजों के लिए चलाया जा रहा ‘नस्लवाद’ कहा है।

वहीं कुछ लोग लेखक के इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं कि सिर्फ पांच साल से इसे उपजाया जा रहा है। भारत में ही काफी पहले से लोग कटहल खाते रहे हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक में कटहल को लोग बड़े चाव से खाते रहे हैं। केरल में हमेशा से कटहल की बहुत अच्छी पैदावार होती थी। कटहल केरल का राजकीय फल है। श्रीलंका के लोगों के खान-पान में भी कटहल का प्रमुख स्थान रहा है।

दरअसल, जिस कटहल को ब्रिटेन का अखबार भद्दा और बदबूदार बता रहा है, उस कटहल के कई औषधीय गुण भी हैं। इस वजह से कुछ खास स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए कटहल खाने की सलाह डाॅक्टर भी देते हैं।

कटहल में कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। इसमें विटामिन-ए, विटामिन-सी, थाइमिन, पोटैशियम, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, आयरन, नियासिन, जिंक और ढेर सारा फाइबर होता है। इस वजह से कटहल स्वास्थ्य के लिए बेहद गुणकारी है।

कटहल में कैलोरी नहीं होने की वजह से इसे दिल के रोगियों के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। कटहल में पोटैशियम होने से यह रक्तचाप नियंत्रित रखता है। इससे भी दिल के मरीजों को लाभ मिलता है। एनीमिया की समस्या से पार पाने में भी कटहल सहायक होता है। क्योंकि इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में होती है।

कटहल खाने से पाचन तंत्र को स्वस्थ्य रखने में भी मदद मिलती है। कब्ज की समस्या के समाधान के लिए भी कटहल उपयोगी है। अस्थमा और थायराॅयड में भी कटहल खाना फायदेमंद रहता है। हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में भी कटहल खाना फायदेमंद साबित होता है। डाॅक्टर कहते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या से भी कटहल बचाता है। जोड़ों के दर्द में भी कटहल खाने की सलाह डाॅक्टर देते हैं।